विज्ञापन के प्रभाव

              विज्ञापन के प्रभाव

विज्ञापन

किसी वस्तु के बारे में जानकारी देना और लोगों को प्रभावित कर वस्तु के मूल्य को बढ़ाना विज्ञापन कहलाता है।विज्ञापन के द्वारा लोगों को बाजार की वस्तुओं से अवगत कराया जाता है। विज्ञापन के प्रभाव उस वस्तु को प्रसिद्धि से दिखाई देते है।

विज्ञापन के प्रभाव

विज्ञापन के प्रभाव

आधुनिकता के दौर में हम अपने चारों ओर से किसी न किसी वस्तु या चीज से घिरे हुए है। किसी भी कार्य को आसान या जल्दी करने के लिए अनेक उपकरणों का निर्माण किया जाता है। जिससे इंसान को अधिक मेहनत भी नही करनी पड़ती और उसका समय भी बच जाता है। 

इन उपकरणों और वस्तुओं को आम आदमी तक पहुँचाने के लिए विज्ञापनों का सहारा लिया जाता है। विज्ञापन के द्वारा ही इंसान किसी वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त करता है।

विज्ञापनों का मानव जीवन, समाज और बाज़ार पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जिससे वस्तुओं और कम्पनियों में भी इनका प्रभाव देखने को मिलता है।

  1. बाजार में प्रतिस्पर्धा।
  2. लोगों को आकर्षित करना।
  3. वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि।
  4. वस्तुओं की जानकारी देना।
  5. लोगों तक वस्तु को पहुँचाना।

1)बाजार में प्रतिस्पर्धा

आज अनेक प्रकार की वस्तुओं का चलन है। बाजार में अनेक वस्तुएँ खरीदी और बेची जाती है। प्रत्येक वस्तु को बेचने और खरीदने का ढंग अलग-अलग होता है। सभी अपनी वस्तुओं को बेचना चाहते है। जिससे वे अपनी वस्तुओं का विज्ञापन दूसरे वस्तुओं के विज्ञापन से प्रभावशाली बनाते है। एक दूसरे से अधिक समान बेचने की होड़ बाजार में लगी रहती है और दुकानदारों के बीच भी प्रतिस्पर्धा का माहौल रहता है।

2) लोगों को आकर्षित करना 

वस्तुओं और समान को बेचने में विज्ञापन एक अहम भूमिका निभाते है। विज्ञापनों को अधिक प्रभावशाली बनाकर वह अपनी वस्तुओं के प्रति लोगों को आकर्षित करते है। जिससे लोग वस्तुओं को खरीदने के लिए उत्साहित होते हैं।

3) वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि

किसी भी वस्तु और समान के प्रभावशाली विज्ञापन से आकर्षित होकर लोग उस वस्तु को खरीदते है। जिससे उस समान की माँग बाजार में बढ़ जाती है। वस्तु की माँग बढ़ने के साथ साथ उस वस्तु के मूल्य में भी वृद्धि होती है।

4) वस्तुओं की जानकारी देना 

जब भी कोई नया समान बाजार में आता है और लोगों को उस समान के बारे में जानकारी नहीं होती है तो विज्ञापन के द्वारा लोगों को उस वस्तु की जानकारी मिलती है।

5) लोगों तक वस्तुओं को पहुँचाना

विज्ञापन के द्वारा लोगों को वस्तुओं के बारे में जानकारी मिलती है। जिनमें कुछ लोग ऐसे भी होते है जो नई नई वस्तुओं को खरीदने के शौकीन होते है। विज्ञापन को देखकर वे वस्तुओं को खरीदते है, जिससे नई वस्तुएं भी लोगों तक पहुँचती है।

जिस प्रकार विज्ञापन के द्वारा वस्तुओं की जानकारी दी जाती है, जोकि लोगों के लिए लाभदायक है। लेकिन विज्ञापन के अन्य भी प्रभाव पर पड़ते है जोकि नुकसानदायक है। 

1.वस्तुओं की कमियों को छिपाना।

2.चकाचौंध को बढ़ावा देना।

3.वस्तु की बिक्री को बढ़ावा देना।

1)वस्तुओं की कमियों को छिपाना

 किसी भी वस्तु के विज्ञापन में केवल उस वस्तु की अच्छाइयों को बताया जाता है। उस वस्तु में क्या क्या कमियां है, इस बात पर कोई भी बात विज्ञापन में नहीं की जाती है। केवल एक पहलू अच्छाई पर ही बात की जाती है। जिससे उसकी कमियां बाद में उपभोक्ता के सामने आती है।

2)चकाचौंध को बढ़ावा देना

 विज्ञापन को इतना सजाया जाता है की उसकी खूबसूरती देखकर भी उपभक्ता प्रभावित हो जाते हैं। उसकी चमक दमक के सामने उपभोक्ता उस वस्तु को खरीद लेता है फिर चाहे उसे उसकी जरूरत हो या न हो।

3)वस्तु की बिक्री को बढ़ावा देना 

किसी भी वस्तु के विज्ञापन का उद्देश्य केवल उस वस्तु की बिक्री को बढ़ावा देना होता है। जिसके कारण कई बार वे वस्तु की गुणवत्ता के साथ समझौता कर लेते है।

यदि किसी चीज की अच्छाई होती है उसी प्रकार उसकी बुराइयाँ भी होती है। इसी प्रकार यदि विज्ञापन के अच्छे प्रभाव है तो विज्ञापन के बुरे प्रभाव भी होते हैं। एक मध्यम वर्ग के उपभोक्ता के लिए केवल वही वस्तु या समान जरूरी है जो उसकी दिनचर्या में इस्तेमाल किए जाते हैं या जो उसके लिए आवश्यक है और उन वस्तुओं के बारे में उसे जानकारी होती है। उसे किसी विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती है।अन्य किसी दिखावे की वस्तु से उसको कोई सरोकार नहीं होता है। विज्ञापन केवल उच्च वर्ग के लोगों और संपन्न लोगों के लिए ही कारगर होते हैं।

अधिकतर पूछे गए प्रश्न

1.विज्ञापन से आप क्या समझते है?

उत्तर: किसी वस्तु के बारे में जानकारी देना और लोगों को प्रभावित कर वस्तु के मूल्य को बढ़ाना विज्ञापन कहलाता है। विज्ञापन के द्वारा लोगों को बाजार की वस्तुओं से अवगत कराया जाता है। विज्ञापन के प्रभाव उस वस्तु को प्रसिद्धि से दिखाई देते है।

2.विज्ञापन का प्रभाव व्यक्तियों पर किस प्रकार पड़ता है?

उत्तर: आधुनिकता के दौर में हम अपने चारों ओर से किसी न किसी वस्तु या चीज से घिरे हुए है। किसी भी कार्य को आसान या जल्दी करने के लिए अनेक उपकरणों का निर्माण किया जाता है। जिससे इंसान को अधिक मेहनत भी नही करनी पड़ती और उसका समय भी बच जाता है। 

इन उपकरणों और वस्तुओं को आम आदमी तक पहुँचाने के लिए विज्ञापनों का सहारा लिया जाता है। विज्ञापन के द्वारा ही इंसान किसी वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त करता है।

3.विज्ञापन का कितने प्रकार से बाजार और लोगों पर प्रभाव पड़ता है?

उत्तर:विज्ञापनों का मानव जीवन, समाज और बाजार पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जिससे वस्तुओं और कंपनियों में भी इनका प्रभाव देखने को मिलता है।

बाजार में प्रतिस्पर्धा।

लोगों को आकर्षित करना।

वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि।

वस्तुओं की जानकारी देना।

लोगों तक वस्तु को पहुंचाना।

4. विज्ञापन लोगों को किस प्रकार आकर्षित करते हैं?

उत्तर:वस्तुओं और समान को बेचने में विज्ञापन एक अहम भूमिका निभाते है। विज्ञापनों को अधिक प्रभावशाली बनाकर वह अपनी वस्तुओं के प्रति लोगों को आकर्षित करते है। जिससे लोग वस्तुओं को खरीदने के लिए उत्साहित होते हैं।

5.विज्ञापन वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि में किस प्रकार सहायक है?

उत्तर:किसी भी वस्तु और समान के प्रभावशाली विज्ञापन से आकर्षित होकर लोग उस वस्तु को खरीदते है। जिससे उस समान की माँग बाजार में बढ़ जाती है। वस्तु की माँग बढ़ने के साथ साथ उस वस्तु के मूल्य में भी वृद्धि होती है।

राष्ट्रीय गान

राष्ट्रगान का अर्थ होता है ऐसी स्तुति या गान, जो राष्ट्रप्रेम की भावना अभिव्यक्त करता हो तथा शासकीय रूप से आधिकारिक राष्ट्रगान के रूप में स्वीकृत हो या जनसाधारण में लोकप्रिय हो।जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है, जो मूलतः बांग्ला भाषा में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखा गया था। 24 जनवरी सन 1950 को संविधान सभा में राष्ट्रगान के रूप में ‘जन गण मन’ के हिन्दी संस्करण को अपनाया गया था। सर्वप्रथम 27 दिसंबर सन 1911 को बांग्ला व हिन्दी भाषा में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था। पूरे गान में पांच पद हैं। राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेण्ड निर्धारित है। कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान संक्षिप्त रूप में भी गाया जाता है। इसमें प्रथम तथा अन्तिम पंक्तियाँ ही बोलते हैं, जिसमें लगभग 20 सेकेण्ड का समय लगता है। संक्षिप्त “जन गण मन” के नाम से प्रख्‍यात शब्दों और संगीत की रचना भारत का राष्‍ट्रगान है।

राष्ट्रीय गान

अपने राष्ट्रीय गान को और अच्छे से समझने के लिए हम निम्नलिखित बिंदुओं को देखेंगे। 

1.भारत के राष्ट्रगान का इतिहास:

असल में राष्ट्रगान (जन-गन-मन) को रबिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा पहले बंगाली में लिखा गया था, लेकिन इसका हिन्दी संस्करण संविधान सभा द्वारा 24 जनवरी 1950 को स्वीकार किया गया। 1911 में टैगोर ने राष्ट्रगान के गीत और संगीत को रचा था और इसको पहली बार कलकत्ता में 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मीटिंग में गाया गया था।राष्ट्रगान का संपूर्ण संस्करण बंगाली से अंग्रेजी में अनुवादित किया गया और इसका संगीत मदनापल्लै में सजाया गया जो कि आंध्रप्रदेश के चित्तुर जिले में है।

जन गण मन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!

पंजाब सिंधु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंगा

बिंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंगा

तब शुभ नामें जागे तब शुभ आशीष माँगे,

गाहे तब जयगाथा।

जन गण मनअधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!

जय हे जय हे जय हे जय जय जय जय हे…..”

2.भारत के राष्ट्रगान जन गण मन का अर्थ

राष्ट्रगान का मौलिक संस्करण अंग्रेजी भाषा से अनुवादित किया था और 1950 में इसमें कुछ संशोधन किया गया था। सिन्ध की जगह सिन्धु किया गया क्योंकि देश के बँटवारे के बाद सिन्ध पाकिस्तान का हिस्सा हो चुका था। राष्ट्रगान का अंग्रेजी अर्थ इस प्रकार है:-

“सभी लोगों के मस्तिष्क के शासक, कला तुम हो,

भारत की किस्मत बनाने वाले।

तुम्हारा नाम पंजाब, सिन्ध, गुजरात और मराठों के दिलों के साथ ही बंगाल, ओड़िसा, और द्रविड़ों को भी उत्तेजित करता है,

इसकी गूँज विन्ध्य और हिमालय के पहाड़ों में सुनाई देती है,

गंगा और जमुना के संगीत में मिलती है और भारतीय समुद्र की लहरों द्वारा गुणगान किया जाता है।

वो तुम्हारे आर्शीवाद के लिये प्रार्थना करते है और तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाते है।

तुम्हारे हाथों में ही सभी लोगों की सुरक्षा का इंतजार है,

तुम भारत की किस्मत को बनाने वाले।

जय हो जय हो जय हो तुम्हारी।”

नीचे कुछ नियमन दिये गये है जो राष्ट्रगान को गाते समय अवश्य ध्यान में रखना चाहिये।

1.इसे किसी भी उत्सव और औपचारिक राज्य के कार्यक्रम में गाया जा सकता है जब राष्ट्रपति, राज्यपाल, और उपराज्यपाल के समक्ष (सरकार और आमजन द्वारा आयोजित) परेड, राष्ट्रीय सलामी आदि संपन्न हो चुका हो।

2.ये राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन के उपरान्त या पहले और राज्यपाल और उपराज्यपाल के आगमन पर गाया जा सकता है।

3.जब नेवी में रंगों को फैलाया जाता हो और रेजीमेंट के रंगों की प्रस्तुति हो।

4.जब किसी खास अवसर पर कोई खास निर्देश भारतीय सरकार द्वारा दिया गया हो। आमतौर पर ये प्रधानमंत्री के लिये नहीं गाया जाता जबकि कई बार ऐसा हो भी सकता है।

5.जब ये किसी बैण्ड द्वारा गाया जाता है, राष्ट्रगान को ड्रम के द्वारा आगे रखना चाहिये या ड्रम के द्वारा 7 की धीमी गति से राष्ट्रीय सलामी संपन्न होने के बाद इसे गाया जाता है। पहला ड्रम धीमी गति से शुरु होना चाहिये और फिर इसके संभव उँचाई तक पहुँचने के बाद अपने सामान्य आवाज में जाना चाहिये।

6.किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में झंडारोहण के बाद।

स्कूलों में सुबह के समय दिन की शुरुआत से पहले।

राष्ट्रगान के दौरान सभी लोगों को इसके सम्मान में खड़े हो जाना चाहिये।

इस राष्ट्र गान को गाने और तिरंगा को नीले आकाश में स्वछंद फहराने के लिए कितने सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी तो हमें उन शहीदों के बलिदान के समर्पण के प्रति निष्ठावान होकर कम से कम खड़े होकर राष्ट्र गान को तो गा ही सकते हैं। हमे हमेशा अपने राष्ट्र गान को सम्मान देना चाहिए। 

प्रश्न/उत्तर

प्रश्न 1.राष्ट्रगान का हमारे जीवन में क्या महत्व है?

उत्तर: राष्ट्रगान भारत का गौरव है और भारतीयों को इस पर बहुत गर्व है। नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित, यह गान भारत की राष्ट्रीय विरासत पर प्रकाश डालता है और देशभक्ति और अपने देश के प्रति वफादारी को प्रदर्शित करता है। ‘जन गण मन’ भारत के इतिहास, परंपराओं और मिश्रित संस्कृति को दर्शाता है। 

प्रश्न 2.अपना राष्ट्रगान क्या है?

उत्तर: जन-गण-मन बंगाली भाषा में लिखी गई है, जिसमें संस्कृत शब्द शामिल है। 27 दिसंबर, 1911 को कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में इस गीत को पहली बार गाया गया। 24 जनवरी 1950 को आधिकारिक तौर पर इस गाने को राष्ट्रगान के तौर पर अपना लिया गया।

प्रश्न 3.भारत के राष्ट्रगान में कितने शब्द हैं?

उत्तर: भारत का राष्ट्रीय गान “जन गण मन अधिनायक जया हे” से शुरू होता है और “जया हे, जया हे, जया हे, जया जया जया जया हे” पर समाप्त होता है। भारत का राष्ट्रगान एक बहुत ही छोटी रचना है जिसमें केवल बावन शब्द हैं।

प्रश्न 4.राष्ट्रगान किसका प्रतीक है?

उत्तर: भारत की राष्‍ट्रीय पहचान के प्रतीक राष्‍ट्र गान – भारत के बारे में जानें। 

प्रश्न 5.सबसे पुराना राष्ट्रगान कौन सा है?

उत्तर: सबसे पुराना राष्ट्रीय गानविल्हेल्मस को आधिकारिक तौर पर 1932 में राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया था, लेकिन इसे 1569 और 1572 के बीच लिखा गया था। यह इसे दुनिया का सबसे पुराना राष्ट्रगान बनाता है।

Difference between Ideal Gas And Real Gas

Introduction

There is no such thing as an ideal gas in the real world; hence, the term “ideal gas” is strictly a theoretical one. An ideal gas is made up of several independently spinning, point-like particles that do not collide with one another in any way. Because it strictly adheres to the ideal gas law, the concept of this ideal gas (theoretical gas) has practical or theoretical significance (or ideal gas equation). The molecules in a real gas do not behave according to the ideal gas law or ideal gas equation because they occupy the necessary space and interact with one another. Because of the interactions between its molecules, cool air at standard pressure and temperature acts like an ideal gas. However, as its temperature and pressure increase, its behaviour changes to that of a real gas.

What is an ideal gas?

An ideal gas, sometimes known as a perfect gas, is a type of gas that has physical properties that are in perfect alignment with an idealised link between pressure, volume, and temperature. Ideal gases are also often referred to as perfect gases. They perfectly follow the different gas laws such as Charles’ law. It follows the ideal gas law which is as follows:

 PV = kT

where k is a constant. 

Properties of an ideal gas

General characteristics of an ideal gas are as follows-

  1. Compressibility is one of the features of an ideal gas because its molecules have so much energy that they push each other closer together when compressed.
  2. Most collisions in an ideal gas with its container are elastic, meaning the gas retains all or almost all of its original velocity after impact.
  3. Because of their compressibility, perfect gases can assume the form of their storage vessel. The gas within the container has a total volume equal to the volume of the container itself.
  4. It is often considered that perfect gases do not interact with one another because of their inert behaviour.
  5. In an ideal gas, the individual molecules or particles are immobile, massless spheres.

Difference between Ideal Gas And Real Gas

Real and ideal gases characteristics

What is real gas?

In contrast to their ideal and non-ideal counterparts, real gases do not have molecules that fill space and interact with one another. In reality, gas does not behave according to the ideal gas law or ideal gas equation. Real gases are therefore developed, modelled, or represented further by factoring in their molar weight and molar volume.

The gas law for real gases is called the Vanderwall equation. It is written as

The variables a and b are determined empirically for individual gases. 

Properties of real gas

General characteristics of a real gas are as follows-

  1. True gas has a measurable volume.
  2. In a genuine gas, the vast majority of collisions are non-elastic, whether with the container or other gas molecules.
  3. In a genuine gas, the molecules will interact with one another by either attractive or repulsive forces.
  4. When compared to an ideal gas, the pressure exerted by the molecules inside this system is lower.
  5. Molecules in a genuine gas can freely clash with one another.

Difference between Ideal gas and Real gas

Summary

The equation PV = nRT, known as the ideal gas law, describes the theoretical behaviour of ideal gases. The molecules of an ideal gas travel at fast speed and in all directions simultaneously. Particles here interact with one another by elastic collision, as intermolecular forces are absent. Non-ideal gases, which include actual gases, are so named because they defy the ideal gas law and equation. Particles in a real gas can collide with each other in a way that is not elastic because the molecules are moving in random directions and the pressure is lower than it would be in an ideal gas.

Frequently Asked Questions

1. What is the kinetic theory of gas?

The kinetic theory of gases makes use of an extremely large number of submicroscopic particles, such as atoms and molecules, in order to characterise the molecular composition of a gas. According to the hypothesis, particles hitting one other and the container walls create gas pressure. The kinetic theory of gases describes temperature, volume, pressure, viscosity, thermal conductivity, and mass diffusivity. It describes all microscopic qualities.

2. What do the constants “a” and “b” depend on in the van der waals equation?

To calculate the attractive forces between gas molecules, scientists use the van der Waals equation, where the constant ‘a’ indicates the strength of the forces and the constant ‘b’ reflects the effective volume filled by the gas molecules. You may also hear it referred to as co-volume or excluded volume.

3. What is the compressibility factor?

The compressibility factor (Z) is a measure of the capability of a gas to compress under external pressure. It is determined by dividing the molar volume of a gas to that of an ideal gas at a constant temperature and pressure. The compressibility factor is equal to one in the case of a perfect gas.

Accuracy And Precision – The Art of Measurement

Introduction

In scientific measurements, it is impossible to achieve perfection and obtain error-free results. Every experiment will have some degree of error, which may vary with each repetition. For instance, the commonly accepted value for Earth’s acceleration due to gravity is 9.80665 \(m/{s^2}\), but if you were to measure it experimentally, you would get a different result. Due to this, it is necessary to have methods to describe errors in measurements. Two important terms that help us evaluate measurement errors are accuracy and precision, and they will be discussed in depth in this article.

Define Accuracy

There always exists a true value of the quantity being measured. For instance, the true value of the refractive index of water is 1.33333. The accuracy of a measurement refers to how close it is to the true value. If a measurement of the refractive index of water gives you the value 1.31, you would consider it to have good accuracy because it is close to the true value. An important thing to note is that accuracy is evaluated on a per-reading basis, and even within a set of readings, each reading may have different accuracy. The overall accuracy of the set can be determined by checking if its mean is close to the true value.

What is Precision?

It is always a good practice to take multiple readings while performing a measurement. This helps minimize errors. For a set of readings to be considered precise, the readings in the set must not deviate too much from each other. For instance, suppose you arrived at the following values while measuring the length of a stick:

  1. 1.01 m
  2. 1.02 m
  3. 0.99 m
  4. 1.02 m

As is evident, all of these readings are significantly close to each other, making this a precise set. Contrary to accuracy, precision is defined for the whole set, not just one reading.

 Accuracy and precision

Accuracy and Precision Examples

The following examples will make the concept clearer:

Example 1: Five friends record the height of their 1.76m tall classmate as follows:

  1. 1.74 m
  2. 1.78 m
  3. 1.73 m
  4. 1.72 m
  5. 1.75 m.

This set is a very precise set since all readings lie close to each other. Within the set, the last measurement is highly accurate since it only deviates 0.01m from the true value. On the other hand, the fourth friend is off by 0.04m and is the least accurate person in the group.

Example 2: This time, let the height measured by the girl’s classmates be:

  1. 1.51 m
  2. 1.61 m
  3. 1.88 m
  4. 1.72 m
  5. 1.80 m

This set demonstrates low precision since the values are spread so far apart we can’t even decipher what the true value could possibly be.

Distinguish between Accuracy and Precision

What is False Precision? 

False precision can be present in data that appears to be more precise than it actually is. This causes the data to be misleading.

This can occur when converting between units, such as when the speed of a car travelling at 40 mph is expressed as 64.3738 km/h, with four significant digits after the decimal point, despite the original measurement having none. Other instances where false precision may appear include:

  1. False precision can arise when unnecessary zeros are added to measurements. For instance, 1 m and 1.00 m are equivalent mathematically, but including the extra zeros in 1.00 m implies a level of precision that may not be achievable by our instrument. This leads to a false sense of precision.

  2. Combination of data that carries varying levels of precision can lead to false precision.

False precision

Quantification of Data

The process of expressing a value in numerical terms is known as “quantification”. This is crucial in science as it gives a more defined and specific description of a phenomenon. For instance, calling a burger large has no scientific meaning. Instead, we must specify the weight of the burger for it to make mathematical sense.

Quantification is necessary as computers only understand numerical data, which is a requirement for computer-based analysis. Furthermore, quantification enables us to conduct statistical analysis, which is useful in fields such as machine learning and artificial intelligence.

Practice Questions

Q1. Given that the refractive index of water is 1.3333, discuss whether the following set is accurate and/or precise.

  1. 1.32
  2. 1.54
  3. 1.11
  4. 1.61
  5. 1.22

Ans. We consider a set like this to be imprecise since the readings vary significantly. At the same time, the value 1.32 is highly accurate, while 1.61 is a very wrong result.

Q2. To measure the length of his pencil, a student uses a metre-scale and writes the result as 0.1237 m. He is given a zero for this measurement. Justify.

Ans. A metre scale does not have the precision the student provided here. It can only measure up to 1 mm, while the student measured it up to one-tenth of a millimetre. This is false precision.

Q3. What makes the following set a bad set of readings for the acceleration due to gravity?

  1. 9.805 \(m/{s^2}\)
  2. 9.005 \(m/{s^2}\)
  3. 10.610 \(m/{s^2}\)
  4. 10.100\(m/{s^2}\)
  5. 9.512 \(m/{s^2}\)

Ans. If we take the average of these readings, it comes out to be only 0.002% away from the standard or accepted value. One might call that accurate, but these readings vary too much from each other and thus, this set is imprecise.

Summary

Measuring without any form of error is impossible, making it crucial for us to understand and quantify errors in scientific experiments. Accuracy and precision are two key elements in analysing such errors. Accuracy refers to the deviation of a measurement from its true or accepted value and is unique to each individual measurement. Precision, on the other hand, reflects the consistency of measurements within a set, and is not defined for a single measurement. A combination of high accuracy and precision results in reliable data, while a lack of either makes a reading or set of reading bad. False precision occurs when data appears more precise than it actually is, often through presentation or the mixing of data with varying precision. 

Quantification, or converting data into numerical form, is an important process since it is necessary for computer analysis, machine learning, and artificial intelligence.

 

Frequently Asked Questions

1. How do you find the percentage error from a known value?

We can calculate percentage error with the following formula:

\({\bf{e}} = \frac{{{\bf{experimental}}{\rm{ }}{\bf{value}} – {\bf{true}}{\rm{ }}{\bf{value}}}}{{{\bf{true}}{\rm{ }}{\bf{value}}}} \times {\bf{100}}{\rm{ }}\% \)

2. How many significant digits should we use while performing calculations?

In theoretical calculations, we use as many significant digits as are provided to us initially. While performing experiments, the number of our significant digits is determined by the limitations of our instruments.

3. Of accuracy and precision, which is more important?

For scientific data to be considered good, it must be both precise and accurate.

4. Discuss accuracy and precision in terms of statistical analysis.

Statistically, a data set is accurate if its mean is close to the accepted or true value. And for the data to be precise, its standard deviation must be small.

5. How do we decide if our data is accurate enough?

As a general guideline, you can determine the error margin allowed by dividing the place value of the least significant digit by 2. 

For instance, if the true value is stated as 43.71 m, the place value of the least significant digit (1) is 0.01 m. Hence, if your measurement is within ±0.005 m of the true value, it can be considered accurate.