अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांश को अंग्रेजी भाषा में unseen passage कहते है। अपठित का अर्थ जो पढ़ा नहीं गया हो के रूप में लिया जाता है। यह ऐसा गद्यांश होता है जो पहले पढ़ा नहीं गया हो। यह गद्यांश किसी भी विषय से संबंधित हो सकता है। इसमें कला, विज्ञान, राजनीति, साहित्य या अर्थशास्त्र कोई भी विषय शामिल हो सकता है।

यह गद्यांश किसी भी पाठयपुस्तक से संबंधित नही होता है। यह किसी भी गद्य का कोई छोटा सा अंश होता है। इसमें गद्यांश से संबंधित प्रश्न पूछे जाते है। जिससे विद्यार्थियों की तर्क शक्ति में वृद्धि होती है। उनका सामान्य ज्ञान पढ़ता है। उनमें सोचने की क्षमता विकसित होती है। उनकी व्यक्तिगत योग्यता में वृद्धि होती है।

अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांश में कोई कहानी, कविता, लेख, निबंध, समाचार, विज्ञापन आदि प्रकार के कुछ अंश शामिल होते हैं। जिनको अपठित सामग्री के रूप में शामिल किया जाता है। इसमें जिस भी गद्यांश को शामिल किया जाता है वह पहले पाठ्यक्रम में शामिल नहीं होता है।  

अपठित गद्यांश को हल करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।गद्यांश को हल करते समय इसकी दो से तीन बार पढ़ना चाहिए जिससे आप उसे अच्छे तरह से समझ सके। 

गद्यांश के प्रश्नों के उत्तर सरल भाषा में देने चाहिए। जिससे उनको पढ़ने में कोई कठिनाई न आए। इनके उत्तर अपनी भाषा में देने चाहिए। जिस भाषा में आप प्रश्न को समझते हैं या जिस सरल भाषा का प्रयोग आप अपने समझने के लिए करते हैं, उसी भाषा का प्रयोग गद्यांश के उत्तर देने में करना चाहिए।

उत्तर कम से कम शब्दों में देने चाहिए या जितने शब्दों में देने के लिए कहा जाए उतने ही शब्दों में देना चाहिए। जितना प्रश्न में पूछा जाए उतना ही उत्तर देना चाहिए। अधिक लंबा उत्तर देने से प्रश्न और उत्तर दोनों  का अर्थ गद्यांश में लगभग खत्म हो जाता हैं। क्योंकि अपठित गद्यांश किसी कहानी, कविता, निबंध का एक अंश होता है, पूर्ण रूप नहीं होता है। इसलिए इनके जवाब छोटे रूप में देने चाहिए।

गद्यांश का शीर्षक गद्यांश का मूल भाव होता है। कभी कभी गद्यांश का शीर्षक शुरुआत या अंत में छुपा होता है। जिस मूल भाव को केंद्रित रख कर गद्यांश का विषय लिया जाता है, जिस गद्यांश पर आधारित होता है। उसी को आधार मानकर शीर्षक लिखा जाता है।

अपठित गद्यांश की भाषा शैली सरल, सुबोध और प्रभावमयी होनी चाहिए। जिससे उसको समझने में कोई भी कठिनाई न आए। गद्यांश की भाषा शैली ऐसी होनी चाहिए जो प्रत्येक विद्यार्थी को आसानी से समझ में आ जाए। किसी कलिष्ठ शब्द या भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

अपठित गद्यांश का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों की तर्क क्षमता को बढ़ाना है। जिससे वह अपनी मानसिक शक्ति का विकास कर सके। खुद को प्रत्येक परिस्थिति के लिए तैयार कर सके। किसी भी अनभिज्ञ प्रश्न को देखकर भयभीत न हो, कुशलता के साथ उनका जवाब दे सके।

इस प्रकार अपठित गद्यांश का प्रयोग विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में ऐसे गद्यांश के रूप में किया जाता है जिसको पहले पढ़ा न जा सका गया है। जो पाठ्यक्रम में नया हो। जिसे पढ़कर वे सवालों के जवाब दे सके। उनकी तर्कशक्ति का विकास हो सके।

अधिकतर पूछे गए प्रश्न

1)अपठित गद्यांश किसे कहते है?

उत्तर-अपठित गद्यांश को अंग्रेजी भाषा में unseen passage कहते है। अपठित का अर्थ जो पढ़ा नहीं गया हो के रूप में लिया जाता है। यह ऐसा गद्यांश होता है जो पहले पढ़ा नहीं गया हो। यह गद्यांश किसी भी विषय से संबंधित हो सकता है। इसमें कला, विज्ञान, राजनीति, साहित्य या अर्थशास्त्र कोई भी विषय शामिल हो सकता है।

2)अपठित गद्यांश के कितने प्रकार शामिल होते हैं।

उत्तर-अपठित गद्यांश में कोई कहानी, कविता, लेख, निबंध, समाचार, विज्ञापन आदि प्रकार के कुछ अंश शामिल होते हैं। जिनको अपठित सामग्री के रूप में शामिल किया जाता है। इसमें जिस भी गद्यांश को शामिल किया जाता है वह पहले पाठ्यक्रम में शामिल नहीं होता है।  

3) अपठित गद्यांश का उद्देश्य क्या होता है?

उत्तर-अपठित गद्यांश का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों की तर्क क्षमता को बढ़ाना है। जिससे वह अपनी मानसिक शक्ति का विकास कर सके। खुद को प्रत्येक परिस्थिति के लिए तैयार कर सके। किसी भी अनभिज्ञ प्रश्न को देखकर भयभीत न हो, कुशलता के साथ उनका जवाब दे सके।

4)अपठित गद्यांश की भाषा शैली कैसी होती है।

उत्तर-अपठित गद्यांश की भाषा शैली सरल, सुबोध और प्रभावमयी होनी चाहिए। जिससे उसको समझने में कोई भी कठिनाई न आए। गद्यांश की भाषा शैली ऐसी होनी चाहिए जो प्रत्येक विद्यार्थी को आसानी से समझ में आ जाए। किसी कलिष्ठ शब्द या भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

5)अपठित गद्यांश के शीर्षक किस प्रकार बनाए जाते हैं?

उत्तर- अपठित गद्यांश का शीर्षक गद्यांश का मूल भाव होता है। कभी कभी गद्यांश का शीर्षक शुरुआत या अंत में छुपा होता है। जिस मूल भाव को केंद्रित रख कर   गद्यांश का विषय लिया जाता है, जिस गद्यांश पर आधारित होता है। उसी को आधार मानकर शीर्षक लिखा जाता है।

वातावरण का अर्थ

‘वातावरण’ के लिए ‘पर्यावरण’ शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘परि + आवरण‘। ‘परि‘ का अर्थ है- ‘चारों ओर’ एवं ‘आवरण‘ का अर्थ है-‘ढकने वाला‘।  इस प्रकार पर्यावरण या वातावरण वह वस्तु है जो चारों ओर से ढके हुए है। अतः हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के चारों ओर जो कुछ है, वह उसका वातावरण है। इसमें वे सभी तत्व सम्मिलित है, जो मानव के जीवन व व्यवहार को प्रभावित करते हैं। पर्यावरण से हमें वह हर संसाधन उपलब्ध हो जाते हैं| जो किसी सजीव प्राणी को जीने के लिए आवश्यक है। पर्यावरण ने हमें वायु, जल, खाद्य पदार्थ, अनुकूल वातावरण आदि उपहार स्वरूप भेंट दिया है। हम सभी ने हमेशा से पर्यावरण के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल किया है और आज हमारे इतना विकास कर पाने के पीछे भी पर्यावरण का एक प्रमुख योगदान रहा है।

वातावरण  जिसे हम पर्यावरण भी कहते हैं उसमें वह सभी प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं जो कई तरीकों से हमारी मदद करते हैं तथा चारों ओर से हमें घेरे हुए हैं। यह हमें बढ़ने तथा विकसित होने का बेहतर माध्यम देता है, यह हमें वह सब कुछ प्रदान करता है जो इस ग्रह पर जीवन यापन करने हेतु आवश्यक है। हमारा पर्यावरण भी हमसे कुछ मदद की अपेक्षा रखता है जिससे की हमारा लालन पालन हो| हमारा जीवन बना रहे और कभी नष्ट न हो। तकनीकी आपदा के वजह से दिन प्रति दिन हम प्राकृतिक तत्व को अस्वीकार रहे हैं। पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए हमें पर्यावरण के वास्तविकता को बनाए रखना होगा। पूरे ब्रम्हांड में बस पृथ्वी पर ही जीवन है। 

वर्षों से प्रत्येक वर्ष 05 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए तथा साथ ही पर्यावरण स्वच्छता और सुरक्षा के लिए दुनिया भर में मनाया जाता है। पर्यावरण दिवस समारोह के विषय को जानने के लिए, हमारे पर्यावरण को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए तथा हमारे उन सभी बुरी आदतों के बारे में जानने के लिए जिससे पर्यावरण को हानि पहुंचता है| हम सभी को इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहिए। धरती पर रहने वाले सभी व्यक्ति द्वारा उठाए गए छोटे कदमों के माध्यम से हम बहुत ही आसान तरीके से पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते हैं। हमें अपशिष्ट की मात्रा में कमी करना चाहिए तथा अपशिष्ट पदार्थ को वहीं फेकना चाहिए जहाँ उसका स्थान है। प्लास्टिक बैग का उपयोग नहीं करना चाहिए तथा कुछ पुराने चीजों को फेकने के बजाय नये तरीके से उनका उपयोग करना चाहिए। धरती पर जीवन के लालन पालन के लिए पर्यावरण प्रकृति का उपहार है। वह प्रत्येक तत्व जिसका उपयोग हम जीवित रहने के लिए करते हैं| वह सभी पर्यावरण के अन्तर्गत आते हैं जैसे- हवा, पानी प्रकाश, भूमि, पेड़, जंगल और अन्य प्राकृतिक तत्व।

हमारा पर्यावरण धरती पर स्वस्थ जीवन को अस्तित्व में रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फिर भी हमारा पर्यावरण दिन-प्रतिदिन मानव निर्मित तकनीक तथा आधुनिक युग के आधुनिकरण के वजह से नष्ट होता जा रहा है। इसलिए आज हम पर्यावरण प्रदूषण जैसे सबसे बड़े समस्या का सामना कर रहे हैं। सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, भावनात्मक तथा बौद्धिक रूप से पर्यावरण प्रदूषण हमारे दैनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण वातावरण में विभिन्न प्रकार के बीमारीयों को जन्म देता है, जिसे व्यक्ति जीवन भर झेलता रहता है। यह किसी समुदाय या शहर की समस्या नहीं है बल्कि दुनिया भर की समस्या है तथा इस समस्या का समाधान किसी एक व्यक्ति के प्रयास करने से नहीं होगा। अगर इसका निवारण पूर्ण तरीके से नहीं किया गया तो एक दिन जीवन का अस्तित्व नहीं रहेगा। प्रत्येक आम नागरिक को सरकार द्वारा आयोजित पर्यावरण आन्दोलन में शामिल होना होगा।

हम सभी को अपनी गलती में सुधार करना होगा तथा स्वार्थपरता त्याग कर पर्यावरण को प्रदूषण से सुरक्षित तथा स्वस्थ करना होगा। यह मानना कठिन है, परन्तु सत्य है की प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उठाया गया छोटा सकारात्मक कदम बड़ा बदलाव कर सकता है तथा पर्यावरण गिरावट को रोक सकता है। वायु तथा जल प्रदूषण द्वारा विभिन्न प्रकार के रोग तथा विकार का जन्म होता है जो हमारे जीवन को खतरे में डालते हैं।

आज के समय में किसी भी चीज को स्वास्थय के दृष्टी से सही नहीं कहा जा सकता, जो हम खाना-खाते हैं| वह पहले से कृत्रिम उर्वरक के बुरे प्रभाव से प्रभावित होता है, जिसके फलस्वरूप हमारे शरीर की रोग प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर होती है जो की सुक्ष्म जीवों से होने वाले रोगों से लड़ने में शरीर को सहायता प्रदान करता हैं। इसलिए, हम में से कोई भी स्वस्थ और खुश होने के बाद भी कभी भी रोगग्रस्त हो सकता है। मानव जाति द्वारा शहरीकरण और औद्योगीकरण के आन्दोलन ने चिकित्सा, उद्योग तथा सामाजिक क्षेत्र को विकसित किया परन्तु प्राकृतिक परादृश्य को कंक्रीट ईमारतों तथा सड़कों में तबदील कर दिया। भोजन तथा पानी के लिए प्रकृति परादृश्यों पर हमारी निर्भरता इतनी अधिक है की हम इन संसाधनों की रक्षा किए बिना जीवित नहीं रह सकते हैं।

पर्यावरण के अभाव में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती तथा हमें भविष्य में जीवन को बचाये रखने के लिए पर्यावरण की सुरक्षा को सुनिश्चित करना होगा। यह पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है। हर व्यक्ति सामने आये तथा पर्यावरण संरक्षण के मुहिम का हिस्सा बने।

पृथ्वी पर विभिन्न चक्र है जो नियमित तौर पर पर्यावरण और जीवित चीजों के मध्य घटित होकर प्रकृति का संतुलन बनाये रखते हैं। जैसे ही यह चक्र विक्षुब्ध (Disturb) होता है पर्यावरण संतुलन भी उससे विक्षुब्ध होता है जो निश्चित रूप से मानव जीवन को प्रभावित करता है। हमारा पर्यावरण हमें पृथ्वी पर हजारों वर्ष तक पनपने तथा विकसित होने में मदद करता है, वैसे ही जैसे की मनुष्य को प्रकृति द्वारा बनाया गया पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी माना जाता है, उन में ब्रम्हांड के तथ्यों को जानने की बहुत उत्सुकता होती है जो की उन्हें तकनीकी उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

हम सभी के जीवन में इस तरह की तकनीक उत्पन्न हुई है, जो दिन प्रति दिन जीवन की संभावनाओं को खतरे में डाल रही है तथा पर्यावरण को नष्ट कर रही है। जिस तरह से प्राकृतिक हवा, पानी, और मिट्टी दुषित हो रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह एक दिन हमें बहुत हानि पहुँच सकता है। यहाँ तक की इसने अपना बुरा प्रभाव मनुष्य, जानवर, पेड़ तथा अन्य जैविक प्राणी पर दिखाना शुरू भी कर दिया है। कृत्रिम रूप से तैयार खाद तथा हानिकारक रसायनों का उपयोग मिट्टी की उर्वरकता को नष्ट करता है, तथा हम जो रोज खाना खाते है उसके माध्यम से हमारे शरीर में एकत्र होता जाता है। औद्योगिक कम्पनीयों से निकलने वाला हानिकारक धुआँ हमारी प्राकृतिक हवा को दुषित करती है जिससे हमारा स्वास्थय प्रभावित होता है, क्योंकि हमेशा हम साँस के माध्यम से इसे ग्रहण करते हैं।

हमें इस बात का खयाल रखना चाहिए कि आधुनिक तकनीक, पारिस्थितिकीय संतुलन को भविष्य में कभी विक्षुब्ध न कर सके। समय आ चुका है कि हम प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय बंद करें और उनका विवेकपूर्ण तरह से उपयोग करें। हमें हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान तथा तकनीक को विकसित करना चाहिए पर हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए की यह वैज्ञानिक विकास भविष्य में पर्यावरण को किसी भी प्रकार से नुकसान न पहुचाए।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. पर्यावरण क्या है?

उत्तर– हमारे चारों तरफ का वह परिवेश जो हमारे लिए अनुकूल है, पर्यावरण कहलाता है।

प्रश्न 2. विश्व पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है?

उत्तर– विश्व पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाता है।

प्रश्न 3. पर्यावरण के मुख्य घटक कौन कौन से हैं?

उत्तर– पर्यावरण के प्रमुख घटक हैं- वायुमंडल, जलमंडल तथा स्थलमंडल।

प्रश्न 4. पर्यावरण प्रदूषण कौन-कौन से हैं?

उत्तर– जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण आदि पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार है।

प्रश्न 5. विश्व का सबसे प्रदूषित देश कौन सा है?

उत्तर– बांग्लादेश विश्व का सबसे प्रदूषित देश है।

साहित्य समाज का दर्पण हैं

साहित्य वह है, जिसमें प्राणी के हित की भावना निहित है। साहित्य मानव के सामाजिक सम्बन्धों को दृढ़ बनाता है; क्योंकि उसमें सम्पूर्ण मानव जाति का हित निहित रहता है। साहित्य द्वारा साहित्यकार अपने भाव और विचारों को समाज में प्रसारित करता है, इस कारण उसमें सामाजिक जीवन स्वयं मुखरित हो उठता है।साहित्य का जन्म मनुष्य के भाव जगत के साथ हुआ है. अपनी अदम्य मनोभावनाओं को मनुष्य ने विविध विधाओं के माध्यम से व्यक्त किया हैं. साहित्य भी उनमें से एक हैं.साहित्य मानव समाज का प्रतिबिम्ब होता हैं. साहित्यकार स्वयं भी एक सामाजिक प्राणी होता है. अतः उसकी कृतियों में समाज का हर पक्ष, हर तेवर और हर आयाम मूर्त हुआ करता हैं। 

साहित्य समाज का दर्पण हैं

साहित्य की विभिन्न परिभाषाएँ – डॉ० श्यामसुन्दरदास ने साहित्य का विवेचन करते हुए लिखा है, “भिन्न-भिन्न काव्य- -कृतियों का समष्टि संग्रह ही साहित्य है।” मुंशी प्रेमचन्द ने साहित्य को “जीवन की आलोचना” कहा है। उनके विचार से साहित्य चाहे निबन्ध के रूप में हो, कहानी के रूप में हो या काव्य के रूप में हो, साहित्य को हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।आंग्ल विद्वान् मैथ्यू आर्नोल्ड ने भी साहित्य को जीवन की आलोचना माना है—“Poetry is, at bottom, a criticism of life.” पाश्चात्य विद्वान् वर्सफील्ड ने साहित्य की परिभाषा देते हुए लिखा है- “Literature is the brain of humanity.” अर्थात् साहित्य मानवता का मस्तिष्क है।

lead magnet

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। क्योंकि समाज की गतिविधियों से साहित्य प्रभावित होता हैl एक साहित्यकार जो कुछ अपने साहित्य में लिखता है, वह समाज का ही एक प्रतिबिंब होता है। साहित्य और समाज का एक अटूट संबंध है। साहित्य के मदद से एक साहित्यकार अपनी भावनाओं को समlज के सामने लाता है। साहित्यकार समाज में रहता है समाज में होने वाली सारी घटनाओं का उस पर परिणाम होता है । यही सारी सामाजिक घटना कहीं ना कहीं उसके साहित्य पर प्रभाव डालती है। यह सारी घटनाएं राग , प्रेम ,उत्साह आदि भावनाओं से संबंधित होती है। यही सारी भावनाएं एक साहित्यकार् की साहित्य में झलकती है तथा उसके साहित्य में जान बनती है। साहित्य समाज का दर्पण है और इस दर्पण में समाज के हर छवि चाहे वह अच्छी हो या बुरी हो वह दिखाई देती है।

कूँसाहित्यकार ने अपने जीवन में जो कुछ अनुभव किया है वह उसे साहित्य में पिरोता है। साहित्य यह युगो युगो से चली आ रही साहित्यकारों के अनुभव की प्रतिलिपि होता है। यह अच्छे या बुरे अनुभव साहित्यकार अपने साहित्य द्वारा व्यक्त करते हैं। अपने भावनाओं को बहुत साहित्य द्वारा प्रकट करते हैं। साहित्य में मानव जाति का हित निहित होता है l साहित्य यह साहित्यकार के भाव तथा विचारों को समाज में प्रकट करने का एक उत्तीर्ण मार्ग है। साहित्यकार अपने शब्द द्वारा अपने भाव व्यक्त करते हैं।

साहित्यकार समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। साहित्य समाज का मुख् होता है। समाज में होने वाली सारी घटनाएं हमें साहित्य से पता चलती है चाहे वह प्राचीन काल की क्यों ना होl समाज में चल रही घटनाओं तथा रूढ परंपराओं को समझने में साहित्य हमारी मदद करते हैं। साहित्य से समाज की भावना प्रकट होती है तथा हम समाज के दिल तक सिर्फ और सिर्फ साहित्य के द्वारा पहुंच सकते हैं। यदि हमें समाज को समझना है तो हमें साहित्य को समझना जरूरी है। साहित्य के हर शब्द यह समाज का दर्पण और प्रतिबिंब होते हैं।

साहित्यकार यह समाज का हितकारी होता है वह अपने साहित्य में हमेशा समाज का हित हो ऐसी चीजें लिखता है। कई साहित्यकारों ने अपने शब्दों से समाज बदल डाला। समाज में नई चेतना तथा प्रेरणा उन्होंने निर्माण की। अंग्रेजों के काल में साहित्यकारों ने समाज में चल रही अंग्रेजों की दादागिरी के बारे में वर्णन किया। अंग्रेजों के विरुद्ध समाज जागृति में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान रहा है। रविंद्र नाथ टैगोर ,मुंशी प्रेमचंद, बंकिम चंद्र चटर्जी तथा आदि साहित्यकारों ने समाज को प्रेरित किया है। प्राचीन काल से समाज में जागृति लाने में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है। साहित्य हमारे विचारों तथा जीवन पर गहरा प्रभाव डालतl हैं। भारतीय आंदोलन के समय साहित्यकारों ने समाज का वर्णन किया जिससे समाज में चल रहे पाखंड का पता सर्व साधारण नागरिकों को चला।

साहित्य यह एक प्रवाह है जो सदियों से चला आ रहा है। समाज के परिस्थितियों के अनुसार कई बार साहित्य में भी परिवर्तन हुए हैं। साहित्य में शराब का दो तथा विजय की शाश्वत दोनों होती है। साहित्य यह समाज में चल रही घटनाओं का ही दूसरा रूप है। साहित्य और समाज को अलग करना यह संभव है। साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक है।अन्त में हम कह सकते हैं कि समाज और साहित्य में आत्मा और शरीर जैसा सम्बन्ध हैं। समाज और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं, इन्हें एक-दूसरे से अलग करना सम्भव नहीं है अतः आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यकार सामाजिक कल्याण को ही अपना लक्ष्य बनाकर साहित्य का सृजन करते रहें।

प्रश्न/उत्तर

प्रश्न 1. साहित्य का अर्थ क्या होता है? 

उत्तर: साहित्य” लैटिन से आता है, और इसका मूल अर्थ ” अक्षरों का उपयोग ” या “लेखन” था। लेकिन जब यह शब्द लैटिन से निकली रोमांस भाषाओं में प्रवेश किया, तो इसने “पुस्तकों को पढ़ने या अध्ययन करने से प्राप्त ज्ञान” का अतिरिक्त अर्थ ग्रहण कर लिया। तो हम इस परिभाषा का उपयोग “साहित्य के साथ … को समझने के लिए कर सकते हैं।

प्रश्न 2. एक साहित्यकार का क्या महत्व है? 

उत्तर: कवि और लेखक अपने समाज के मस्तिष्क भी हैं और मुख भी। साहित्यकार की पुकार समाज की पुकार है। साहित्यकार समाज के भावों को व्यक्त कर सजीव और शक्तिशाली बना देता है। वह समाज का उन्नायक और शुभचिन्तक होता है। उसकी रचना में समाज के भावों की झलक मिलती है। उसके द्वारा हम समाज के हृदय तक पहुँच जाते हैं।

प्रश्न 3.साहित्य हमें क्या सिखाता है?

उत्तर: साहित्य हमें भावनाओं की एक विस्तृत श्रृंखला तक खोलता है । हम खुद को दूसरों की जगह रखकर अपना नजरिया बदलना सीखते हैं। हम सीखते हैं कि हम कौन हैं और हम कौन बनना चाहते हैं। और हम विकल्पों के दूसरे क्रम के परिणामों का अनुभव करते हैं बिना उन्हें स्वयं जीने के।

प्रश्न 4.साहित्य के 5 प्रकार कौन से हैं?

उत्तर: कविता, कथा, गैर-काल्पनिक, नाटक और गद्य साहित्य की पाँच प्रमुख विधाएँ हैं। लेखक तब अपने साहित्य को उपजातियों में वर्गीकृत कर सकते हैं।

प्रश्न 5.भाषा और साहित्य में क्या अंतर है?

उत्तर: जबकि साहित्य बौद्धिक विचारों और चिंतन के साथ लेखकों के लिखित कार्य होते हैं, भाषा सभी ध्वनियों, संकेतों, प्रतीकों, शब्दों और व्याकरण के बारे में होती है।

 

लड़का लड़की एक समान

प्राचीन भारत से ही भारतीय समाज में लड़कों को लड़कियों से अधिक महत्व दिया जाता है। एक घर में जहाँ पर लड़का होने की खुशी मनाई जाती थी वहीं दूसरी तरफ लड़की होने का दुख भी उतना ही मनाया जाता था। पितृसत्ता समाज की विचारधारा के अनुसार लड़के को वंश बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था। उनके कारण ही परिवार का कुल आगे बढ़ता था। 

समाज में लड़की को केवल एक बोझ के रूप में माना जाता था। उसके जन्म होते ही उसके परिवार को उसके शादी में दहेज की चिंता सताने लगती थी। 

लड़के को पढ़ने के सभी साधन उपलब्ध कराए जाते थे जभी लकड़ी को घर से बाहर ही नहीं जाने दिया जाता था। उनके खाने-पीने में भी भेदभाव किया जाता था। लड़कियों को केवल घर के काम ही सिखाए जाते थे। चूल्हा चौका उसे अच्छे से सिखाया जाता था। ताकि उसकी शादी के बाद उसको कोई परेशानी न आए और अपनी शादी को बचाए रखे। लड़कियों की शादी करने उनके माता – पिता का एकमात्र लक्ष्य होता था।

पहले लड़के भी लड़कियों को खुद से कमजोर समझते थे। उनकी मन में भी लड़कियों के प्रति सम्मान को भावना नहीं थी। वे खुद को लड़कियों से उच्च समझते थे।

लड़का लड़की एक समान

लेकिन आधुनिक भारत की तस्वीर बदल रही है। आज के समाज में लड़का और लड़की के प्रति लोगों को विचारधारा में बदलाव आ रहा है। उन्हें लड़के के साथ साथ लड़कियों की महत्ता भी समझ में आ गई है। उनका नजरिया बदलने लगा है।

  1. लड़का और लड़की के जन्म पर समान खुशियाँ मनाना।
  2. लड़के और लड़की को समान शिक्षा देना।
  3. लड़के और लड़कियों को नौकरी के समान अवसर देना।
  4. लड़के और लड़की को एक समान समझना।

1)लड़के और लड़कियों के जन्म पर खुशियाँ मनाना

आज बेटे और बेटी के जन्म पर एक जैसी खुशियां मनाई जाती है। बेटी का लोग अपने घर की लक्ष्मी के रूप में स्वागत करते है। लड़के और लड़की के जन्म पर एक जैसे कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। लड़की के जन्म लेने से किसी को कोई दुख नहीं होता है।

2)लड़के और लड़की को समान शिक्षा

लड़का और लकड़ी दोनों को ही पढ़ने के समान अवसर प्रदान किए जाते है। दोनों को ही घर से बाहर जाने दिया जाता है।

आज के समय में लड़के भी लड़कियों को अपने समान समझते है। वे उनके साथ उनके काम में भी हाथ बँटाते है। लड़कियों और लड़कों को अपनी आजादी और आधिकारों के बारे में जानकारी दी जाती है।

3)नौकरी के समान अवसर प्रदान करना

आज के भारत में लड़के और लड़कियाँ केवल अपने ही देश में नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी भारत का नाम रोशन कर रहे है। आज लड़कियाँ लड़कों की तरह सेना, आर्मी में भर्ती होती है। वे प्रत्येक विभाग में अपना योगदान देती है, यहाँ तक कि राजनीति में भी शामिल होती है। यह सभी दोनों को समान अवसर प्रदान करने के कारण ही संभव हो पाया है।

4) लड़के और लड़की को एक समान समझना

आज लड़के और लड़की को एक समान समझा जाता है। समाज में एक जैसा व्यवहार उनके साथ किया जाता है। घर में भी लड़कों की सलाह के साथ साथ लड़कियों की भी सलाह ली जाती है।

हम यह तो नहीं कह सकते है की आज संपूर्ण भारत में लड़के और लड़कियों को समान समझा जाता है।लेकिन उनकी सोच थोड़ी जरूर बदली है। पहले को स्थिति से बेहतर विचार जरूर है। लड़की और लड़कों को समान विकास करना हमारे देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों को बराबर अधिकार देने से ही हम अपनी, अपने समाज की ओर अपने देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में बदलाव ला सकते है और इसमें बदलाव आ भी रहे है। 

लड़कों की तरह लड़कियाँ भी राजनीति में बढ़ चढ़ कर भाग लेती है और अपने विचारों को जनता के सामने रखती है। उसी प्रकार लड़कों को भी बाहर के कामों के साथ साथ घर के कामों की भी जानकारी होती है। उनकी विचारधारा में इस प्रकार बदलाव आ गया है की अब वे समझने लगे है की लड़कियाँ और औरतें सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं होती है।

अधिकतर पूछे गए प्रश्न

1.प्राचीन भारतीय समाज में लड़कियों की स्थिति कैसी थी?

उत्तर: प्राचीन भारत से ही भारतीय समाज में लड़कों को लड़कियों से अधिक महत्व दिया जाता है। एक घर में जहाँ पर लड़का होने की खुशी मनाई जाती थी वहीं दूसरी तरफ लड़की होने का दुख भी उतना ही मनाया जाता था। पितृसत्ता समाज की विचारधारा के अनुसार लड़के को वंश बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था। उनके कारण ही परिवार का कुल आगे बढ़ता था। 

2.आज के समाज में लड़कियों की स्थिति कैसे है।

उत्तर: आधुनिक भारत की तस्वीर बदल रही है। आज के समाज में लड़का और लड़की के प्रति लोगों को विचारधारा में बदलाव आ रहा है। उन्हें लड़के के साथ साथ लड़कियों की महत्ता भी समझ में आ गई है। उनका नजरिया बदलने लगा है।

3.आज लड़के और लड़कियां किस प्रकार समाज में अपना योगदान दे रहे है।

उत्तर:आज के भारत में लड़के और लड़कियां केवल अपने ही देश में नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी भारत का नाम रोशन कर रहे है। आज लड़कियाँ लड़कों की तरह सेना, आर्मी में भर्ती होती है। वे प्रत्येक विभाग में अपना योगदान देती है, यहाँ तक कि राजनीति में भी शामिल होती है। यह सभी दोनों को समान अवसर प्रदान करने के कारण ही संभव हो पाया है।

4.आधुनिक भारत में लड़के और लड़कियों की स्थिति में क्या बदलाव आया है?

उत्तर:आधुनिक भारत की तस्वीर बदल रही है। आज के समाज में लड़का और लड़की के प्रति लोगों को विचारधारा में बदलाव आ रहा है।उन्हें लड़के के साथ साथ लड़कियों की महत्ता भी समझ में आ गई है। उनका नजरिया बदलने लगा है।

    1)लड़का और लड़की के जन्म पर समान खुशियाँ मनाना।

   2)लड़के और लड़की को समान शिक्षा देना।

   3)लड़के और लड़कियों को नौकरी के समान अवसर देना।

  4)लड़के और लड़की को एक समान समझना।

5.आज आप लड़के और लड़कियों की समान शिक्षा के बारे में क्या समझते है?

उत्तर:लड़का और लकड़ी दोनों को ही पढ़ने के समान अवसर प्रदान किए जाते है। दोनों को ही घर से बाहर जाने दिया जाता है।

आज के समय में लड़के भी लड़कियों को अपने समान समझते है। वे उनके साथ उनके काम में भी हाथ बँटाते है। लड़कियों और लड़कों को अपनी आजादी और आधिकारों के बारे में जानकारी दी जाती है।

राजकीय प्रतीक

राष्ट्रीय चिह्न एक प्रतीक या मुहर है जिसे किसी राष्ट्र या बहु-राष्ट्रीय राज्य द्वारा अपने प्रतीक के रूप में उपयोग के लिए आरक्षित किया जाता है। कई देशों में राष्ट्रीय प्रतीक है। हालांकि राष्ट्रीय प्रतीक होना जरूरी नहीं है, इसका झंडा किसी देश की पहचान भी कर सकता है। राष्ट्रीय चिन्ह कुछ भी हो सकता है। कुछ पंजीकृत प्रतीक फूल , जानवर, पक्षी आदि है। इस चिह्न का प्रयोग सरकारी कागजों- दस्तावेजों, अभिलेखों, प्रपत्रों, मुद्रा आदि पर किया जाता है।

राजकीय प्रतीक

राष्ट्रीय प्रतीकों का हर राष्ट्र के लिए बड़ा ही महत्त्व होता है; क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वह राष्ट्र विश्व में माना जाता है । उसके अस्तित्व की पहचान इन्हीं प्रतीकों से होती है । जब कोई राष्ट्र गुलाम होता है, तो यही चिन्ह उसकी राष्ट्रीयता का प्रतीक बनकर उसके संघर्ष को एक गति देता है । राष्ट्र के इन प्रतीकों के प्रति वहां के निवासियों में एक गर्व भरा रोमांच होता है ।राष्ट्रीय महोत्सवों के अवसर पर यह प्रतीक समूचे देश को एकता के सूत्र में बांधते हैं । भारत जैसे विविध धर्मावलम्बी राष्ट्र के लिए उसे भावात्मक एकता के साथ बांधने में राष्ट्रीय प्रतीकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। 

स्वतन्त्र एवं लोकतन्त्रात्मक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत के विभिन्न राष्ट्रीय प्रतीकों में राष्ट्रध्वज का सर्वाधिक महत्त्व है । भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है । यह हाथ से काते हुए सूत और हाथ से बने हुए खादी के कपड़े का बना होता है, जो सूती या रेशमी हो सकता है । झंडे की आकृति आयताकार होती है, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई का अनुपात 3:2 होता है ।

इसमें केसरिया, सफेद और हरे रंग की तीन समानान्तर पट्टियां होती हैं । बीच की श्वेत पट्टी पर नीले रंग का चक्र अंकित होता है, जिसमें चौबीस तीलियां होती हैं, जो अशोक स्तम्भ के शीर्ष भाग पर अंकित अन्तिम चक्र की अनुकृति है।यह चक्र मौर्य सम्राट अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित सिंह शीर्ष स्तम्भ से लिया गया है । राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप संविधान निर्मात्री सभा द्वारा 22 जुलाई, 1947 को अपनाया गया और 14 अगस्त, 1947 को प्रस्तुत किया गया ।

भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ, उत्तर प्रदेश में स्थित अशोक स्तंभ के ऊपर वर्णित तीन सिंह (शेर) का एक रूपांतर है, और इसे राष्ट्रीय आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते के साथ जोड़ा गया है।इस प्रतीक को 26 जनवरी, 1950 को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। यह भारत के नए अधिग्रहीत गणराज्य की स्थिति की घोषणा थी। राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग केवल आधिकारिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है और भारत के नागरिकों से ईमानदारी से सम्मान की मांग करता है। यह सभी राष्ट्रीय और राज्य सरकार के कार्यालयों के लिए आधिकारिक मुहर के रूप में काम करता है और सरकार द्वारा उपयोग किए जाने वाले किसी भी लेटर हेड का  एक जरूरी हिस्सा है।यह सभी मुद्रा नोटों के साथ-साथ भारत गणराज्य द्वारा जारी किए गए पासपोर्ट जैसे राजनयिक पहचान दस्तावेजों पर प्रमुखता से प्रदर्शित होता है। राष्ट्रीय प्रतीक भारत की संप्रभुता का प्रतीक है। 

भारत का राज्य चिन्ह मौर्य सम्राट अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित सिंह स्तम्भ से लिया गया है। सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ में 4 शेर की मूर्ति है जिसमे से 3 ही शेर दिखाई देते हैं, इसके सामने अशोक चक्र बाईं ओर सरपट दौड़ता हुआ घोड़ा और दाईं ओर बैल दिखाई देता है। अशोक चक्र वास्तव में बौद्ध धर्म चक्र का एक रूप है। तीनों शेर लंबे खड़े हैं और शांति, न्याय और सहिष्णुता के प्रति देश की प्रतिबद्धता की घोषणा करते हैं।इसकी संरचना में प्रतीक इस तथ्य पर जोर देता है कि भारत संस्कृतियों का संगम है, इसकी विरासत वेदों से दार्शनिक सिद्धांतों के लिए गहरी प्रशंसा के साथ बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक आध्यात्मिक सिद्धांतों में छिपी हुई है।वास्तविक लायन कैपिटल एक उल्टे कमल पर बैठता है जिसे राष्ट्रीय प्रतीक प्रतिनिधित्व में शामिल नहीं किया गया है। इसके बजाय, लायन कैपिटल के प्रतिनिधित्व के नीचे, सत्यमेव जयते शब्द देवनागरी लिपि में लिखा गया है, जो भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य भी है। यह शब्द मुंडक उपनिषद के एक उद्धरण हैं, जो चार वेदों में सबसे अंतिम और सबसे दार्शनिक है और इसका अर्थ है; ‘केवल सत्य की जीत’। 

 

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. राष्ट्रीय प्रतीक का अर्थ क्या होता हैं? 

उत्तर- राष्ट्रीय चिह्न एक प्रतीक या मुहर है जिसे किसी राष्ट्र या बहु-राष्ट्रीय राज्य द्वारा अपने प्रतीक के रूप में उपयोग के लिए आरक्षित किया जाता है।

प्रश्न 2. भारत का राष्ट्रपति क्या है? 

उत्तर- भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ, उत्तर प्रदेश में स्थित अशोक स्तंभ के ऊपर वर्णित तीन सिंह (शेर) का एक रूपांतर है,

प्रश्न 3. भारत के राज्य प्रतीक को राजकीय प्रतीक के रूप में कब अपनाया गया था? 

उत्तर-इस प्रतीक को 26 जनवरी, 1950 को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया था।

प्रश्न 4. राज्य चिन्ह क्या क्या हैं? 

उत्तर- राज्य चिन्ह : राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र गान, राष्ट्र खेल, राष्ट्र फूल आदि है। 

प्रश्न 5. भारत की राष्ट्रीय प्रतीक के बारे में बताइए। 

उत्तर. भारत का राज्य चिन्ह मौर्य सम्राट अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित सिंह स्तम्भ से लिया गया है। सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ में 4 शेर की मूर्ति है जिसमे से 3 ही शेर दिखाई देते हैं, इसके सामने अशोक चक्र बाईं ओर सरपट दौड़ता हुआ घोड़ा और दाईं ओर बैल दिखाई देता है। अशोक चक्र वास्तव में बौद्ध धर्म चक्र का एक रूप है। तीनों शेर लंबे खड़े हैं और शांति, न्याय और सहिष्णुता के प्रति देश की प्रतिबद्धता की घोषणा करते हैं।इसकी संरचना में प्रतीक इस तथ्य पर जोर देता है कि भारत संस्कृतियों का संगम है, इसकी विरासत वेदों से दार्शनिक सिद्धांतों के लिए गहरी प्रशंसा के साथ बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक आध्यात्मिक सिद्धांतों में छिपी हुई है।

राष्ट्रीय पशु

राष्ट्रीय पशु का अर्थ होता  हैं- एक जानवर  जो किसी देश का प्रतीक है। भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ हैं। बाघ एक जंगली जानवर है, जिसे भारत में भारतीय सरकार के द्वारा राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। राजसी बाघ, तेंदुआ टाइग्रिस धारीदार जानवर है। इसकी मोटी पीली लोमचर्म का कोट होता है जिस पर गहरी धारीदार पट्टियाँ  होती हैं। लावण्‍यता, ताकत, फुर्तीलापन और अपार शक्ति के कारण बाघ को भारत के राष्‍ट्रीय जानवर के रूप में गौरवान्वित किया है। बाघ राष्ट्रीय पशु है, जो बिल्ली के परिवार के अन्तर्गत आता है।

राष्ट्रीय पशु

इसका वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस है। यह बिल्ली के परिवार के सबसे बड़े जानवर के रुप में जाना जाता है। यह विभिन्न रंगों; जैसे – शरीर पर अलग-अलग काली धारियों के साथ नारंगी, सफेद, और नीला रंग का पाया जाता है। वे ऊपरी तौर पर अलग हो सकते हैं, पर उनके नीचे का पेट वाला भाग एक ही तरह सफेद रंग का होता है। वे प्रजातियों, उपजातियों और स्थानों के आधार पर अलग-अलग आकार और वजन के पाए जाते हैं।इसके चार दाँत (दो ऊपर के जबड़े में दो नीचे के जबड़े में) बहुत ही नुकीले, तेज और मजबूत होते हैं, जो भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के उद्देश्य से शिकार करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। बाघ की लम्बाई और ऊँचाई क्रमशः 8 से 10 फिट और 3 से 4 फिट होती है।

नर बाघ जन्म के 4-5 साल बाद परिपक्व होते हैं, जबकि मादा 3-4 साल की आयु में परिपक्व हो जाती हैं। संभोग के लिए कोई निश्चित मौसम नहीं होता है। गर्भावस्था अवधि 95-112 दिन की होती है और एक बार में 1-5 बच्चों को जन्म दे सकते है। युवा पुरुष अपनी मां के क्षेत्र को छोड़ देते हैं जबकि महिला बाघ उसके करीब क्षेत्र में ही रहती हैं। भारतीय संस्कृति में बाघ हमेशा प्रमुख स्थान पर रहा है। राष्ट्रीय पशु के रूप में एक उचित महत्व प्रदान करने के लिए रॉयल बंगाल बाघ को भारतीय मुद्रा नोटों के साथ-साथ डाक टिकटों में भी चित्रित किया गया है।

यह एक मांसाहारी पशु है और खून और मांस का बहुत ही शौकीन होता है। यह कभी-कभी जंगल से किसी पशु यहाँ तक कि, मनुष्य को भी भोजन के रुप में खाने के लिए गाँवों की ओर जाते हैं। यह अपने शिकार (जैसे – हिरन, जेबरा और अन्य जानवरों) पर अपनी बहुत मजबूत पकड़ रखता है और उन पर मजबूत जबड़ों और तेज पंजों के माध्यम से अचानक आक्रमण करता है। आमतौर पर, यह दिन के दौरान सोता है और रात के समय शिकार करता है। जंगली जानवरों को भोजन की आवश्यकता और जरूरत के बिना मारना इसकी प्रकृति और शौक है, जो इसकी अन्य जानवरों के सामने ताकत और शक्ति प्रदर्शित करती है। यही कारण है कि, यह बहुत ही क्रूर और निर्दयी पशु के रुप में जाना जाता है

ज्ञात आठ किस्‍मों की प्रजाति में से शाही बंगाल टाइगर (बाघ) उत्‍तर पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर देश भर में पाया जाता है और पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है, जैसे नेपाल, भूटान और बांग्‍लादेश। भारत में बाघ आमतौर पर सुन्दर वन (असम, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा, मध्य भारत आदि) में पाए जाते हैं। अधिक बड़े चीते अफ्रीकी जंगलों में पाए जाते हैं हालांकि, सभी में रॉयल बंगाल टाइगर सबसे अधिक सुन्दर लगते हैं। बाघों को मारना, उस समय से पूरे देश में निषेध है, जब उनकी संख्या में बहुत तेजी से गिरावट हो रही थी।

बाघ को जंगल का राजा कहा जाता है और यह हमारे देश  के समृद्ध वन्य जीवन को दर्शाता है। शक्ति और फुर्ती बाघ के बुनियादी पहलू हैं। भारत में बाघों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर शुरु किया गया। सन् 1973 में बंगाल टाइगर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया। इससे पहले शेर भारत का राष्ट्रीय पशु था। साल 1969 में वन्यजीव बोर्ड ने शेर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया था। लेकिन साल 1973 में राष्ट्रीय पशु का दर्जा शेर को हटा कर बाघ को दिया गया।

भारतीय संस्कृति में बाघ हमेशा प्रमुख स्थान पर रहा है। राष्ट्रीय पशु के रूप में एक उचित महत्व प्रदान करने के लिए रॉयल बंगाल बाघ को भारतीय मुद्रा नोटों के साथ-साथ डाक टिकटों में भी चित्रित किया गया है। राष्ट्रीय पशु के रूप में एक उचित महत्व प्रदान करने के लिए रॉयल बंगाल बाघ को भारतीय मुद्रा नोटों के साथ-साथ डाक टिकटों में भी चित्रित किया गया है।बाघ को जंगल का भगवान कहा जाता है, क्योंकि इन्हें देश में जंगली जीवन में धन का प्रतीक माना गया है। बाघ ताकत, आकर्षक, बहुत अधिक शक्ति और चपलता का मिश्रण होता है, जो इसके आदर और सम्मान का बहुत बड़ा कारण है। यह अनुमान लगाया गया है कि, कुल बाघों की संख्या का आधा भाग भारत में रहता है। यद्यपि, पिछले कुछ दशकों में, भारत में बाघों की संख्या में निरंतर बड़े स्तर पर कमी आई है।

भारत की सरकार द्वारा “प्रोजेक्ट टाइगर” को 1973 में, देश में शाही पशु के अस्तित्व को बचाने के लिए शुरु किया गया था।भारत में बाघों की घटती जनसंख्‍या की जांच करने के लिए अप्रैल 1973 में प्रोजेक्‍ट टाइगर (बाघ परियोजना) शुरू की गई। अब तक इस परियोजना के अधीन 27 बाघ के आरक्षित क्षेत्रों की स्‍थापना की गई है जिनमें 37, 761 वर्ग कि.मी. क्षेत्र शामिल है।साइबेरियन टाइगर को सबसे बड़ा बाघ माना जाता है। मादा बाघ, नर बाघ से थोड़ी छोटी होती है। कुछ दशक पहले, बाघों की प्रजाति निरंतर खतरे में थी हालांकि, भारत में “प्रोजेक्ट टाइगर” के कारण स्थिति नियंत्रण में है। पहले मनुष्यों द्वारा उनका शिकार बहुत से उद्देश्यों; जैसे – खेल, परंपरा, चिकित्सक दवाइयाँ आदि के लिए भारी मात्रामें किया जाता था। “प्रोजेक्ट टाइगर” की पहल भारत सरकार के द्वारा अप्रैल 1973 में बाघों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए की गई थी।

प्रोजेक्ट टाइगर अभियान को शुरु करने के कुछ वर्ष बाद ही, भारत में बाघों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। 1993 की बाघों की जनगणना के अनुसार, देश में बाघों की कुल संख्या लगभग 3,750 थी। प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत लगभग पूरे देश में 23 संरक्षण केन्द्रों (33,406 वर्ग किलो.मी. के क्षेत्र में) की स्थापना की गई थी।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1. राष्ट्रीय पशु कैसे चुने जाते हैं? 

उत्तर- राष्ट्रीय पशु का चयन कई मानदंडों के आधार पर किया जाता है। पहला यह है कि यह कितनी अच्छी तरह से उन कुछ विशेषताओं को दर्शाता है जिनके साथ एक राष्ट्र पहचाना जाना चाहता है। राष्ट्र की विरासत और संस्कृति के हिस्से के रूप में राष्ट्रीय पशु का एक समृद्ध इतिहास होना चाहिए। राष्ट्रीय पशु को देश के भीतर अच्छी तरह से वितरित किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2.  हमारा राष्ट्रीय पशु क्या है? 

उत्तर- भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ हैं। सन् 1973 में बंगाल टाइगर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया। इससे पहले शेर भारत का राष्ट्रीय पशु था। साल 1969 में वन्यजीव बोर्ड ने शेर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया था। लेकिन साल 1973 में राष्ट्रीय पशु का दर्जा शेर को हटा कर बाघ को दिया गया।

प्रश्न 3. प्रोजेक्ट टाइगर क्या है? 

उत्तर- भारत की सरकार द्वारा “प्रोजेक्ट टाइगर” को 1973 में, देश में शाही पशु के अस्तित्व को बचाने के लिए शुरु किया गया था।भारत में बाघों की घटती जनसंख्‍या की जांच करने के लिए अप्रैल 1973 में प्रोजेक्‍ट टाइगर (बाघ परियोजना) शुरू की गई। अब तक इस परियोजना के अधीन 27 बाघ के आरक्षित क्षेत्रों की स्‍थापना की गई है जिनमें 37, 761 वर्ग कि.मी. क्षेत्र शामिल है। साइबेरियन टाइगर को सबसे बड़ा बाघ माना जाता है। मादा बाघ, नर बाघ से थोड़ी छोटी होती है। कुछ दशक पहले, बाघों की प्रजाति निरंतर खतरे में थी हालाँकि, भारत में “प्रोजेक्ट टाइगर” के कारण स्थिति नियंत्रण में है। पहले मनुष्यों द्वारा उनका शिकार बहुत से उद्देश्यों; जैसे – खेल, परंपरा, चिकित्सक दवाइयाँ आदि के लिए भारी मात्रामें किया जाता था। “प्रोजेक्ट टाइगर” की पहल भारत सरकार के द्वारा अप्रैल 1973 में बाघों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए की गई थी।

प्रश्न 4.बाघ के प्रजातियों के बारे में बताइए। 

उत्तर- बाघ के 8 प्रजातियाँ होती है। आठ किस्‍मों की प्रजाति में से शाही बंगाल टाइगर (बाघ) उत्‍तर पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर देश भर में पाया जाता है और पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है, जैसे नेपाल, भूटान और बांग्‍लादेश। भारत में बाघ आमतौर पर सुन्दर वन (असम, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा, मध्य भारत आदि) में पाए जाते हैं। अधिक बड़े चीते अफ्रीकी जंगलों में पाए जाते हैं हालांकि, सभी में रॉयल बंगाल टाइगर सबसे अधिक सुन्दर लगते हैं।

प्रश्न 5. प्रोजेक्ट टाइगर का क्या असर हुआ? 

उत्तर- प्रोजेक्ट टाइगर अभियान को शुरु करने के कुछ वर्ष बाद ही, भारत में बाघों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। 1993 की बाघों की जनगणना के अनुसार, देश में बाघों की कुल संख्या लगभग 3,750 थी। प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत लगभग पूरे देश में 23 संरक्षण केन्द्रों (33,406 वर्ग किलो.मी. के क्षेत्र में) की स्थापना की गई थी।

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

जीवन में हार जीत तो लगी रहती है। हम यदि कोई भी कार्य कर रहे तो उसका एक ही परिणाम होगा या तो जी या तो हार। हमें कोई भी कार्य बिना उसका परिणाम सूची करना चाहिए। परिणाम कुछ भी हो पर हमें हमेशा अच्छा ही सोचना चाहिए। कहा जाता है मन के हारे हार है मन के जीते जीत जिसका अर्थ यह होता है कि यदि अगर हम मन से ही हार जाएंगे तो हम कभी भी अपने कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर पाएँगे और यदि हमारे मन में यह दृढ़ता रहेगी कि हमें जीतना है तो हम हार कर भी जीत जाएँगे।

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

हमारे द्रुढ मन की शक्ति हमें कुछ भी करवा सकती है। यदि हम निश्चय कर ले तो हम पहाड़ पर भी विजय प्राप्त कर सकते हैं l कभी कभी हमें छोटी सी राई भी पहाड़ की तरह मालूम होती है। हम हारने से पहले ही अपनी हार मान लेते हैं। जिस व्यक्ति ने रणभूमि में शत्रु को देख हार मान ली वह व्यक्ति कभी युद्ध नहीं जीत सकता। हर क्षेत्र में जीत हासिल करने के लिए हमें कुशल ज्ञान के साथ-साथ खुद पर आत्मविश्वास का होना जरूरी है। यदि हम हार का अनुभव करेंगे तो हम निश्चित ही हारेंगे। यदि हम जीत का अनुभव करते हैं तो हमारे जीतने के अवसर बढ़ जाएँगे।हार और जीत किसी के हाथों में नहीं होती पर हमें हार से पहले ही हार नहीं माननी चाहिए। जिससे खुद पर भरोसा हो वह हार को जीत में बदल सकता है। विजय का मुख्य कारण मेहनत के साथ उत्साह तथा द्रुढ निश्चय होता है। जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने के लिए द्रुढ निश्चय होना जरूरी है। यदि हमारा मन कमजोर पड़ जाए तो निराशा हम पर हावी हो जाती है।

हमारे दुख सुख सारे हमारे मन पर निर्भर करते हैं। यदि हमारे मन पर नियंत्रण हो तो हम बड़े से बड़ा दुख मुस्कुराकर सहन कर जाते हैं। इसीलिए तो कहते हैं मन के हारे हार और मन के जीते जीत। यदि कोई मनुष्य अपने मन में अपनी हार नीचे समझता है तो इस धरती पर उस व्यक्ति को कोई नहीं जिता सकता। यदि हमें सांसारिक बंधनों से छुटकारा पाना है तो अपने मन पर नियंत्रण करना जरूरी है। यदि हमारे मन पर संयम ना हो तो इसके हमें विपरीत परिणाम मिलते हैं। इसलिए हमें सकारात्मक विचार रखना चाहिए। हमें अपने चंचल मन को स्थिर बनाना चाहिए। ताकि हम जीत के और अपने लक्ष्य के करीब जा सके। यदि हमारा मन चंचल है तो लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना कठिन हो जाता है। मनुष्य के विचारों का परिणाम उसके कार्य पर पड़ता है। इसीलिए हमें अपने विचार सकारात्मक रखनी चाहिए। ताकि हमारे हर कार्य का परिणाम भी सकारात्मक आ सके।

संस्कृत की एक कहावत है–’मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’ अर्थात् मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। तात्पर्य यह है कि मन ही मनुष्य को सांसारिक बन्धनों में बाँधता है और मन ही बन्धनों से छुटकारा दिलाता है। यदि मन न चाहे तो व्यक्ति बड़े–से–बड़े बन्धनों की भी उपेक्षा कर सकता है। शंकराचार्य ने कहा है कि “जिसने मन को जीत लिया, उसने जगत् को जीत लिया।” मन ही मनुष्य को स्वर्ग या नरक में बिठा देता है। स्वर्ग या नरक में जाने की कुंजी भगवान् ने हमारे हाथों में ही दे रखी है।

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत॥ अर्थात् दुःख और सुख तो सभी पर पड़ा करते हैं, इसलिए अपना पौरुष मत छोड़ो; क्योंकि हार और जीत तो केवल मन के मानने अथवा न मानने पर ही निर्भर है, अर्थात् मन के द्वारा हार स्वीकार किए जाने पर व्यक्ति की हार सुनिश्चित है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति का मन हार स्वीकार नहीं करता तो विपरीत परिस्थितियों में भी विजयश्री उसके चरण चूमती है। जय–पराजय, हानि–लाभ, यश–अपयश और दुःख–सुख सब मन के ही कारण हैं; इसलिए व्यक्ति जैसा अनुभव करेगा वैसा ही वह बनेगा।मन की दृढ़ता के कुछ उदाहरण हमारे सामने ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनमें मन की संकल्प–शक्ति के द्वारा व्यक्तियों ने अपनी हार को विजयश्री में परिवर्तित कर दिया। महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की जीत का कारण यही था कि श्रीकृष्ण ने उनके मनोबल को दृढ़ कर दिया था। नचिकेता ने न केवल मृत्यु को पराजित किया, अपितु यमराज से अपनी इच्छानुसार वरदान भी प्राप्त किए। सावित्री के मन ने यमराज के सामने भी हार नहीं मानी और अन्त में अपने पति को मृत्यु के मुख से निकाल लाने में सफलता प्राप्त की।

अल्प साधनोंवाले महाराणा प्रताप ने अपने मन में दृढ़–संकल्प करके मुगल सम्राट अकबर से युद्ध किया। शिवाजी ने बहुत थोड़ी सेना लेकर ही औरंगजेब के दाँत खट्टे कर दिए। द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका द्वारा किए गए अणुबम के विस्फोट ने जापान को पूरी तरह बरबाद कर दिया था, किन्तु अपने मनोबल की दृढ़ता के कारण आज वही जापान विश्व के गिने–चुने शक्तिसम्पन्न देशों में से एक है। दुबले–पतले गांधीजी ने अपने दृढ़ संकल्प से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला दिया था। इस प्रकार के कितने ही उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हार–जीत मन की दृढ़ता पर ही निर्भर है।

देखा गया है कि जिस काम के प्रति व्यक्ति का रुझान अधिक होता है, उस कार्य को वह कष्ट सहन करते हुए भी पूरा करता है। जैसे ही किसी कार्य के प्रति मन की आसक्ति कम हो जाती है, वैसे–वैसे ही उसे सम्पन्न करने के प्रयत्न भी शिथिल हो जाते हैं। हिमाच्छादित पर्वतों पर चढ़ाई करनेवाले पर्वतारोहियों के मन में अपने कर्म के प्रति आसक्ति रहती है। आसक्ति की यह भावना उन्हें निरन्तर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहती है।

मन सफलता की कूँजी है। जब तक न में किसी कार्य को करने की तीव्र इच्छा रहेगी, तब तक असफल होते हुए भी उस काम को करने की आशा बनी रहेगी। एक प्रसिद्ध कहानी है कि एक राजा ने कई बार अपने शत्रु से युद्ध किया और पराजित हुआ। पराजित होने पर वह एकान्त कक्ष में बैठ गया। वहाँ उसने एक मकड़ी को ऊपर चढ़ते देखा। मकड़ी कई बार ऊपर चढ़ी, किन्तु वह बार–बार गिरती रही। अन्तत: वह ऊपर चढ़ ही गई। इससे राजा को अपार प्रेरणा मिली। उसने पुनः शक्ति का संचय किया और अपने शत्रु को पराजित करके अपना राज्य वापस ले लिया। इस छोटी–सी कथा में यही सार निहित है कि मन के न हारने पर एक–न–एक दिन सफलता मिल ही जाती है।

मन को शक्तिसम्पन्न बनाने के लिए सबसे पहले उसे अपने वश में रखना होगा।अर्थात् जिसने अपने मन को वश में कर लिया, उसने संसार को वश में कर लिया, किन्तु जो मनुष्य मन को न जीतकर स्वयं उसके वश में हो जाता है, उसने मानो सारे संसार की अधीनता स्वीकार कर ली।मन को शक्तिसम्पन्न बनाने के लिए हीनता की भावना को दूर करना भी आवश्यक है। जब व्यक्ति यह सोचता है कि मैं अशक्त हूँ, दीन–हीन हूँ, शक्ति और साधनों से रहित हूँ तो उसका मन कमजोर हो जाता है। इसीलिए इस हीनता की भावना से मुक्ति प्राप्त करने के लिए मन को शक्तिसम्पन्न बनाना आवश्यक है।

मन परम शक्तिसम्पन्न है। यह अनन्त शक्ति का स्रोत है। मन की इसी शक्ति को पहचानकर ऋग्वेद में यह संकल्प अनेक बार दुहराया गया है–”अहमिन्द्रो न पराजिग्ये” अर्थात मैं शक्ति का केन्द्र हैं और जीवनपर्यन्त मेरी पराजय नहीं हो सकती है। यदि मन की इस अपरिमित शक्ति को भूलकर हमने उसे दुर्बल बना लिया तो सबकुछ होते हुए भी हम अपने को असन्तुष्ट और पराजित ही अनुभव करेंगे और यदि मन को शक्तिसम्पन्न बनाकर रखेंगे तो जीवन में पराजय और असफलता का अनुभव कभी न होगा।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1.”मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” किसकी पंक्ति है? 

उत्तर- “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।।” अर्थात- जीवन में जय और पराजय केवल मन के भाव हैं। यानी जब हम किसी कार्य के शुरू में ही हार मान लेते हैं कि हम सचमुच में ही हार जाते हैं।

प्रश्न 2.”मन के हारे हार है,मन के जीते जीत” है इस पंक्ति का तात्पर्य क्या है? 

उत्तर- इसका तात्पर्य यह है कि मन ही मनुष्य को सांसारिक बन्धनों में बाँधता है और मन ही बन्धनों से छुटकारा दिलाता है। यदि मन न चाहे तो व्यक्ति बड़े–से–बड़े बन्धनों की भी उपेक्षा कर सकता है। शंकराचार्य ने कहा है कि “जिसने मन को जीत लिया, उसने जगत् को जीत लिया।” मन ही मनुष्य को स्वर्ग या नरक में बिठा देता है। स्वर्ग या नरक में जाने की कुंजी भगवान् ने हमारे हाथों में ही दे रखी है।

प्रश्न 3.”मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” भाव पल्लवन कीजिए। 

उत्तर-मन के हारे हार है, मन के जीते जीत॥ अर्थात् दुःख और सुख तो सभी पर पड़ा करते हैं, इसलिए अपना पौरुष मत छोड़ो; क्योंकि हार और जीत तो केवल मन के मानने अथवा न मानने पर ही निर्भर है, अर्थात् मन के द्वारा हार स्वीकार किए जाने पर व्यक्ति की हार सुनिश्चित है।

प्रश्न 4.हारने से क्या होता है?

उत्तर- मन से हारने का अर्थ होता है _ कि आपको किसी वस्तु या चीज से दूर रहना है, पर आप अपने आपको उसे प्राप्त करने से रोक नही पाते। जैसे आपको मीठा खाना मना है, क्योकि वजन कम करना है। पर जैसे ही गरमा गर्म गुलाब जामुन कोई आपके पास लाता है या आप कही देखते है तो उसे खाने से रोक नही पाते ।

प्रश्न 5.जो वाक्यांश अपने सामान्य अर्थ को छोड़कर किसी विशेष अर्थ को प्रकट करता है वह _____ कहलाता है?

उत्तर- जो वाक्यांश अपने सामान्य अर्थ को छोड़कर किसी विशेष अर्थ को प्रकट करता है, वह मुहावरा कहलाता है। हिंदी भाषा में मुहावरों का प्रयोग भाषा को सुंदर, प्रभावशाली, संक्षिप्त तथा सरल बनाने के लिए किया जाता है। वे वाक्यांश होते हैं। इनका प्रयोग करते समय इनका शाब्दिक अर्थ न लेकर विशेष अर्थ लिया जाता है। 

दहेज नारी शक्ति का अपमान है

महाकवि कालिदास ने अपनी विश्वप्रसिद्ध रचना ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में महर्षि कण्व से कहलवाया है–

“अर्थो हि कन्या परकीय एव।” 

अर्थात् कन्या पराया धन है, न्यास है, धरोहर है।

न्यास और धरोहर की सावधानी से सुरक्षा करना तो सही है, किन्तु उसके पाणिग्रहण को दान कहकर वर–पक्ष को सौदेबाजी का अवसर प्रदान करना तो कन्या–रत्न के साथ घोर अन्याय है।

दहेज नारी शक्ति का अपमान है

दहेज़ प्रथा का अर्थ है शादी के समय दुल्हन के परिवार द्वारा दूल्हे के परिवार को दी गयी रुपये (नकदी), आभूषण, फर्नीचर, सम्पति और अन्य कीमती वस्तुएँ आदि। इस सिस्टम (प्रणाली) को दहेज़ प्रणाली कहा जाता है। परन्तु ये तो आप जानते ही होंगे कि दहेज़ लेना और दहेज़ देना अपराध है।आज दहेज समस्या कन्या के जन्म के साथ ही, जन्म लेने वाली विकट समस्या बन चुकी है। आज कन्या एक ऋण–पत्र है, ‘प्रॉमिज़री नोट’ है और पुत्र विधाता के बैंक से जारी एक ‘गिफ्ट चैक’ बन गया है।दहेज की परम्परा आज ही जन्मी हो, ऐसा नहीं है, दहेज तो हजारों वर्षों से इस देश में चला आ रहा है। प्राचीन ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख मिलता है।प्राचीन समय में दहेज नव–दम्पत्ती को नवजीवन आरम्भ करने के उपकरण देने का और सद्भावना का चिह्न था। उस समय दहेज कन्या पक्ष की कृतज्ञता का रूप था। कन्या के लिए दिया जाने वाला धन, स्त्री–धन था, किन्तु आज वह कन्या का पति बनने का शुल्क बन चुका है।आज दहेज अपने निकृष्टतम रूप को प्राप्त कर चुका है। अपने परिवार के भविष्य को दाँव पर लगाकर समाज के सामान्य व्यक्ति भी इस मूर्खतापूर्ण होड़ में सम्मिलित हो जाते हैं।

माता-पिता अपनी बेटी को दहेज़ देकर ससुराल में उसका जीवन सुखमई बनाने की कोशिश करते है दहेज़ प्रथा से कई औरतें खुले तरीके से रह पाती है क्योंकि दहेज़ में मिली नकदी, संपत्ति, फर्नीचर, कार और अन्य प्रॉपर्टी उनके लिए एक वित्तीय सहायता की तरह काम करती है। इससे दूल्हा और दुल्हन अपना जीवन की अच्छी शुरुआत कर सकते है लेकिन क्या यह एक वैलिड रीज़न है? यदि ऐसा ही है तो दुल्हन के परिवार पर पूरा भोज डालने के बजाय दोनों परिवार को उनके करियर बनाने के लिए इन्वेस्ट करना चाहिए।

इस स्थिति का कारण सांस्कृतिक रूढ़िवादिता भी है। प्राचीनकाल में कन्या को वर चुनने की स्वतंत्रता थी। किन्तु जब से माता–पिता ने उसको किसी के गले बाँधने का पुण्य कार्य अपने हाथों में ले लिया है तब से कन्या अकारण ही हीनता की पात्र बन गई है। वर पक्ष से कन्या पक्ष को हीन समझा जाने लगा है।इस भावना का अनुचित लाभ वर–पक्ष पूरा–पूरा उठाता है। घर में चाहे साइकिल भी न हो, परन्तु बाइक पाए बिना तोरण स्पर्श न करेंगे। बाइक की माँग तो पुरानी हो चुकी अब तो कार की मांग उठने लगी है। बेटी का बाप होना जैसे पूर्व जन्म और वर्तमान जीवन का भीषण पाप हो गया है।

दहेज के दानव ने भारतीयों की मनोवृत्तियों को इस हद तक दूषित किया है कि कन्या और कन्या के पिता का सम्मान–सहित जीना कठिन हो गया है। इस प्रथा की बलिवेदी पर न जाने कितने कन्या–कुसुम बलिदान हो चुके हैं। लाखों पारिवारिक जीवन की शान्ति को नष्ट करने और मानव की सच्चरित्रता को मिटाने का अपराध इस प्रथा ने किया है।तथाकथित बड़ों को धूमधाम से विवाह करते देख–छोटों का मन भी ललचाता है और फिर कर्ज लिए जाते हैं, मकान गिरवी रखे जाते हैं। घूस, रिश्वत, चोरबाजारी और उचित–अनुचित आदि सभी उपायों से धन–संग्रह की घृणित लालसा जागती है। सामाजिक जीवन अपराधी भावना और चारित्रिक पतन से भर जाता है। एक बार ऋण के दुश्चक्र में फंसा हुआ गृहस्थ अपना और अपनी सन्तान का भविष्य नष्ट कर बैठता है।यह समस्या इसके मूल कारणों पर प्रहार किये बिना नहीं समाप्त हो सकती। शासन कानूनों का दृढ़ता से पालन कराये, यदि आवश्यक हो तो विवाह–कर भी लगाये ताकि धूमधाम और प्रदर्शन समाप्त हो। स्वयं समाज को भी सच्चाई से इस दिशा में सक्रिय होना पड़ेगा। दहेज–लोभियों का सामाजिक बहिष्कार करना होगा। कन्याओं को स्वावलम्बी और स्वाभिमानी बनना होगा।

सरकार ने दहेज़ प्रथा को रोकने के लिए साल 1975 में कानून बनाया था। कानून के अनुसार दहेज़ लेना और दहेज़ देना क़ानूनी अपराध है। सरकार द्वारा दहेज़ विरोधी कानून को और एफ्फेक्टेड बनाने के लिए संसदीय कमीटी बनाने का गठन किया है। साल 1983 में दहेज़ से सम्बंधित नए कानून सबके सामने लाये गए। जिसके अनुसार यदि कोई दहेज़ के लालच में किसी भी महिला को आत्महत्या करने पर मजबूर करेंगे उसे व उसके परिवार को दण्डित किया जायेगा। इसी के साथ दहेज़ प्रथा के कारण नारी पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए उपाय करने होंगे। बता देते है यदि कोई व्यक्ति दहेज़ लेता है तो उसे एक्ट 1961 के तहत दहेज़ लेने के लिए 3 साल की सजा हो सकती है।

ये तो सभी जानते है कि दहेज़ प्रथा इतनी जल्दी पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकती लेकिन हमे ये प्रयास करना होगा कि हम इसे सबसे पहले अपने से शुरू करना होगा जिसके बाद ही यह धीरे-धीरे खत्म हो सकेगा अन्यथा हमारी आने वाली पीड़ी के लिए यह प्रथा और भी खतरनाक हो जाएगी और ऐसी ही कई महिलाओं के साथ दहेज़ प्रथा के कारण अत्याचार होता रहेगा।

 

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1. दहेज प्रथा कब शुरू हुआ? 

उत्तर-अथर्ववेद के अनुसार, दहेज़ प्रथा ”वहतु” के रूप में उत्तर वैदिक काल में शुरू हुयी थी। उस समय लड़की का पिता उसे ससुराल विदा करते समय कुछ तोहफे देता था, जिसे वहतु कहते थे। यह सिर्फ अपनी ख़ुशी से दिए हुए तोहफे होते थे।

प्रश्न 2. दहेज की शुरुआत किसने की?

उत्तर-भारत में, मध्यकाल में इसकी जड़ें हैं जब शादी के बाद अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए दुल्हन को उसके परिवार द्वारा नकद या वस्तु के रूप में उपहार दिया जाता था। औपनिवेशिक काल के दौरान, यह शादी करने का एकमात्र कानूनी तरीका बन गया, जब अंग्रेजों ने दहेज प्रथा को अनिवार्य कर दिया।

प्रश्न 3.भारत में दहेज प्रथा के क्या कारण है?

उत्तर-लैंगिक भेदभाव और अशिक्षा दहेज़ प्रथा का प्रमुख कारन है। दहेज प्रथा के कारण कई बार यह देखा गया है कि महिलाओं को एक दायित्व के रूप में देखा जाता है और उन्हें अक्सर अधीनता हेतु विवश किया जाता है तथा उन्हें शिक्षा या अन्य सुविधाओं के संबंध में दोयम दर्जे की सुविधाएँ दी जाती हैं।

प्रश्न 4. दहेज क्यों दिया जाता था?

उत्तर-मूल रूप से, दहेज दुल्हन या दुल्हन के परिवार को दिया जाता था, इसके विपरीत नहीं! दहेज का मूल उद्देश्य दुल्हन के परिवार को उसके श्रम और उसकी प्रजनन क्षमता के नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति करना था।

प्रश्न 5. भारत में दहेज प्रथा को किसने रोका?

उत्तर- भारत की संसद द्वारा अनुमोदित दहेज निषेध अधिनियम 1961 और बाद में भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी और 498ए सहित विशिष्ट भारतीय कानूनों के तहत दहेज का भुगतान लंबे समय से प्रतिबंधित है।

मानसिक सुख और संतोष

जब आवै संतोष धन सब धन धुरि समान

संतोषी सदा सुखी

गौधन गजधन वाजिधन और रतन धन खानि

जब आवै संतोष धन सब धन धुरि समान

आज भले ही संतोषी स्वभाव वाले व्यक्ति को मुर्ख और कायर कहकर हंसी उड़ाई जाय लेकिन संतोष ऐसा गुण हैं जो आज भी सामाजिक सुख शांति का आधार बन सकता हैं।असंतोष और लालसा ने श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को उपेक्षित कर दिया हैं. चारों ओर इर्ष्या, द्वेष और अस्वस्थ होड़ का बोलबाला हैं. परिणामस्वरूप मानव जीवन की सुख शान्ति नष्ट हो गयी हैं.

मानसिक सुख और संतोष

दुनिया में धन का हमेशा महत्त्व रहा है। धन से सब कुछ खरीदा जाता है। धन को सुख का साधन माना गया है। आज मनुष्य का सारा जीवन धन कमाने में ही बीतता है। इसके लिए वह उचित–अनुचित सब उपाय अपनाता है। आर्थिक मनोकामनाएँ निरंतर पूरी होते रहने पर भी मनुष्य असन्तुष्ट रहता है।

आध्यात्मिक धन–असंतोष मानव जीवन का अभिशाप है और संतोष मानव जीवन का वरदान है। इस सम्बन्ध में भारत के अनेक कवियों की काव्य–पंक्तियों को उद्धृत किया जा सकता है।

साईं इतना दीजियो जामें कुटुंब समाय।

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।

कबीर मीत न नीत गलीत है जो धरिये धन जोर।

खाए खरचे जो बचै तौ जोरिये करोर। – बिहारी

उपर्युक्त सभी कवियों ने एक ही बात पर जोर दिया है कि संसार में संतोषरूपी धन ही सबसे बड़ा धन है और जब यह प्राप्त हो जाता है तो संसार में किसी धन की आवश्यकता नहीं रह जाती।

आज सारा संसार पूँजीवादी व्यवस्था को अपनाकर अधिक–से–अधिक धन कमाने की होड़ में लगा हुआ है। उसकी मान्यता है कि कैसे भी कमाया जाय अधिक धन कमाना चाहिए। धनोपार्जन के लिए मनुष्य किसी भी सीमा तक गिर सकता है। अनुचित साधनों द्वारा अर्जित काला धन ही लोगों की उज्ज्वलता का माध्यम बन गया है। अत: संसार की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था दूषित हो गई है।अधिक–से–अधिक धन बटोरने की होड़ मची है। अमीर और अमीर बन रहा है। गरीब और गरीब होता जा रहा है। गरीब मजबूर है, आत्महत्या करने को विवश है। मानव–जाति आज जिस स्थिति में पहुंच गई है, उसका कारण कहीं बाहर नहीं है स्वयं मनुष्य के विचारों में ही है। आज का मानव इतना स्वार्थी हो गया है कि उसे केवल अपना सुख ही दिखाई देता है। वह स्वयं अधिक से अधिक धन कमाकर संसार का सबसे अमीर व्यक्ति बनना चाहता है। यही असंतोष का कारण है।

सम्पूर्ण मानव जाति आज जिस स्थिति में पहुच गई हैं. इसका कारण कहीं बाहर नहीं हैं, स्वयं मनुष्य के मन में ही हैं. आज का मानव इतना स्वार्थी हो गया हैं कि उसे केवल अपना सुख ही दिखाई देता हैं।वह स्वयं अधिक से अधिक धन कमाकर संसार का सबसे अमीर व्यक्ति बनना चाहता हैं. फोबर्स नामक पत्रिका ने इस स्पर्द्धा को और बढ़ा दिया हैं. इस पत्रिका में विश्व के धनपतियों की सम्पूर्ण सम्पति का ब्यौरा होता हैं। तथा उसी के अनुसार उन्हें श्रेणी प्रदान की जाती है. अतः सबसे ऊपर नाम लिखाने की होड़ में धनपतियों में आपाधापी मची हुई हैं. यह सम्पति असंतोष का कारण बनी हुई हैं. इसके अतिरिक्त घोर भौतिकवादी दृष्टिकोण भी असंतोष का कारण बना हुआ हैं। खाओ पियो मौज करो यही आज का जीवन दर्शन बन गया हैं। इसी कारण सारी नीति और मर्यादाएं भूलकर आदमी अधिक से अधिक धन और सुख सुविधाएं बटोरने में लगा हुआ हैं. कवि प्रकाश जैन के शब्दों में

“हर ओर धोखा झूठ फरेब, हर आदमी टटोलता है दूसरे की जेब”

प्राचीनकाल से आज तक अनेक महापुरुषों ने इस विषय में अपने विचार व्यक्त किये हैं तथा निष् रूप में यही कहा है कि “धन केवल साधन है साध्य नहीं”। अत: संतोष धन प्राप्त करने में नहीं है। उपनिषद, है–”तेन त्यक्तेन भुंजीथा” जो त्याग करने में समर्थ है उसे ही भोगने का अधिकार है। अत: संतोष में हो सुख है। किन्तु यः उपदेश केवल गरीबों के लिए है और इकतरफा है।

इच्छाओं का अंत नहीं, तृष्णा कभी शांत नहीं होती, असंतुष्टि की दौड़ कभी खत्म नहीं होती, जो धन असहज रूप से आता हैं।वह कभी सुख शान्ति नहीं दे सकता, झूठ बोलकर, तनाव झेलकर अपराध भावना का बोझ ढोते हुए, न्याय, नीति, धर्म से विमुख होकर जो धन कमाया जाएगा, उससे चिंताएं, आशंकाए और भय ही मिलेगा सुख नहीं. इस सारे जंजाल से छुटकारा पाने का एक ही उपाय हैं संतोष की भावना।

आज नहीं तो कल धन के दीवानेपन को अक्ल आएगी. धन समस्याओं को हल कर सकता हैं भौतिक सुख सुविधाओ को दिला सकता हैं,किन्तु मन की शान्ति तथा चिंताओं और शंकाओं से रहित जीवन धन से नहीं संतोष से ही प्राप्त हो सकता हैं. संतोषी सदा सुखी यह कथन आज भी प्रासंगिक हैं. असंतोषी तो सिर धुनता हैं तब संतोषी सुख की नीद सोता हैं.निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि संतोष का उपदेश देना ही काफी नहीं है। उत्पादन के साधनों का समान वितरण भी जरूरी है। जब समाज में असमानता नहीं होगी, अमीरी–गरीबी के दो ऊँचे–नीचे पर्वत नहीं बने होंगे तो असंतोष स्वयं ही नष्ट हो जायेगा।

प्रश्न/उत्तर

प्रश्न 1. संतोष क्या होता हैं? 

उत्तर: संतोष का अर्थ है तृप्ति! यह एक अवधारणा है‌। अगर कोई मनुष्य अपने मन-मस्तिष्क में इसे धारण कर पाता है, तो वह सुखी हो जाता है। संतोष से संतुष्टि मिलती है और संतुष्टि संतुष्ट होने का भाव है, तृप्त होने का भाव है।

प्रश्न 2.मानसिक सुख का अर्थ क्या है?

हम मानसिक सुखों को मानसिक घटनाओं के लिए आत्मा की प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं (हालांकि एक स्तर पर, यहां तक ​​कि मानसिक या मानसिक घटनाओं को विशुद्ध रूप से भौतिक शब्दों में समझाया जा सकता है, परमाणुओं की गति के रूप में)।

प्रश्न 3.जीवन में सुख से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: जीवन में ‘सुख’ का अभिप्राय केवल उपभोग-सुख नहीं है। परन्तु आजकल लोग केवल उपभोग के साधनों को भोगने को ही ‘सुख’ कहने लगे है। विभिन्न प्रकार के मानसिक, शारीरिक तथा सूक्ष्म आराम भी ‘सुख’ कहलाते। 

प्रश्न 4.मस्तिष्क में सुख कहां होता है?

उत्तर: मस्तिष्क का आनंद केंद्र तंत्रिका कोशिकाओं के माध्यम से आगे बढ़ने के लिए जाना जाता है जो न्यूरोकेमिकल डोपामिन का उपयोग करके संकेत करता है और आम तौर पर वीटीए में स्थित होता है । डोपामिनर्जिक न्यूरॉन्स आनंद संकेतों को पारित करने के लिए एक “उल्लेखनीय क्षमता” प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 5.जीवन में सुख किस कारण से होता है?

उत्तर: एंडोर्फिन – खुशी के हार्मोन – जो आकर्षण महसूस करने से जुड़े हैं। डोपामाइन, जो तब उत्पन्न होता है जब हम संतुष्ट महसूस करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम खुश, उत्साहित और उत्तेजित महसूस करते हैं। ऑक्सीटोसिन, जो रिश्तों से जुड़ा हुआ है और हमें अन्य मनुष्यों के साथ संबंध बनाने में मदद करता है।

पढ़े बेटियाँ, बढ़े बेटियाँ

कहा जाता है कि एक सुघड़, सुशील और सुशिक्षित स्त्री दो कुलों का उद्धार करती है। विवाह से पहले वह अपने मातृकुल को सुधारती है और विवाह के बाद अपने पतिकुल को। उनके इस महत्त्व को प्रत्येक देश–काल में स्वीकार किया जाता रहा है, किन्तु यह विडम्बना ही है कि उनके अस्तित्व और शिक्षा पर सदैव से संकट छाया रहा है।

बीते कुछ दशकों में यह संकट और अधिक गहरा हुआ है, जिसका परिणाम यह हुआ कि देश में बालक–बालिका लिंगानुपात सन् 1971 ई० की जनगणना के अनुसार प्रति एक हजार बालकों पर 930 बालिका था, जो सन् 1991 ई० में घटकर 927 हो गया। सन् 2011 ई० की जनगणना में यह बढ़कर 943 हो गया। मगर इसे सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता। जब तक बालक–बालिका लिंगानुपात बराबर नहीं हो जाता, तब तक किसी भी प्रगतिशील बुद्धिवादी समाज को विकसित या प्रगतिशील समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती। महिला सशक्तीकरण की बात करना भी तब तक बेमानी ही है।

माननीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीजी ने इस तथ्य के मर्म को जाना–समझा और सरकारी स्तर पर एक योजना चलाने की रूपरेखा तैयार की। इसके लिए उन्होंने 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा राज्य से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की। योजना के महत्त्व और महान् उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत भारत सरकार के बाल विकास मन्त्रालय, स्वास्थ्य मन्त्रालय, परिवार कल्याण मन्त्रालय और मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की संयुक्त पहल से की गई। इस योजना के दोहरे लक्ष्य के अन्तर्गत न केवल लिंगानुपात की असमानता की दर में सन्तुलन लाना है, बल्कि कन्याओं को शिक्षा दिलाकर देश के विकास में उनकी भागेदारी को सुनिश्चित करना है। सौ करोड़ रुपयों की शुरूआती राशि के साथ इस योजना के माध्यम से महिलाओं के लिए कल्याणकारी सेवाओं के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया जा रहा है। सरकार द्वारा लिंग समानता के कार्य को मुख्यधारा से जोड़ने के अलावा स्कूली पाठ्यक्रमों में भी लिंग समानता से जुड़ा एक अध्याय रखा जाएगा। इसके आधार पर विद्यार्थी, अध्यापक और समुदाय कन्या शिशु और महिलाओं की आवश्यकताओं के लिए अधिक संवेदनशील बनेंगे और समाज का सौहार्दपूर्ण विकास होगा।

पढ़े बेटियाँ, बढ़े बेटियाँ

बेटियों को आगे बढ़ाने के उपाय

हमारी बेटियाँ आगे बढ़ें और देश के विकास में अपना योगदान करें, इसके लिए अनेक उपाय किए जा सकते हैं, जिनमें से कुछ मुख्य उपाय इस प्रकार हैं-

(क) पढ़ें बेटियाँ–बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और मुख्य उपाय यही है कि हमारी बेटियाँ बिना किसी बाधा और सामाजिक बन्धनों के उच्च शिक्षा प्राप्त करें तथा स्वयं अपने भविष्य का निर्माण करने में सक्षम हों। अभी तक देश में बालिकाओं की शिक्षा की स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। शहरी क्षेत्रों में तो बालिकाओं की स्थिति कुछ ठीक भी है, किन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति बड़ी दयनीय है। बालिकाओं की अशिक्षा के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग उन्हें ‘पराया धन’ मानते हैं।उनकी सोच है कि विवाहोपरान्त उसे दूसरे के घर जाकर घर–गृहस्थी का कार्य सँभालना है, इसलिए पढ़ने–लिखने के स्थान पर उसका घरेलू कार्यों में निपुण होना अनिवार्य है। उनकी यही सोच बेटियों के स्कूल जाने के मार्ग बन्द करके घर की चहारदीवारी में उन्हें कैद कर देती है। बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले समाज की इसी निकृष्ट सोच को परिवर्तित करना होगा।

(ख) सामाजिक सुरक्षा–बेटियाँ पढ़–लिखकर आत्मनिर्भर बनें और देश के विकास में अपना योगदान दें, इसके लिए सबसे आवश्यक यह है कि हम समाज में ऐसे वातावरण का निर्माण करें, जिससे घर से बाहर निकलनेवाली प्रत्येक बेटी और उसके माता–पिता का मन उनकी सुरक्षा को लेकर सशंकित न हो। आज बेटियाँ घर से बाहर जाकर सुरक्षित रहें और शाम को बिना किसी भय अथवा तनाव के घर वापस लौटें, यही सबसे बड़ी आवश्यकता है।आज घर से बाहर बेटियाँ असुरक्षा का अनुभव करती हैं, वे शाम को जब तक सही–सलामत घर वापस नहीं आ जाती, उनके माता–पिता की साँसें गले में अटकी रहती हैं। उनकी यही चिन्ता बेटी को घर के भीतर कैद रखने की अवधारणा को बल प्रदान करती है। जो माता–पिता किसी प्रकार अपने दिल पर पत्थर रखकर अपनी बेटियों को पढ़ा–लिखाकर योग्य बना भी देते हैं, वे भी उन्हें रोजगार के लिए घर से दूर इसलिए नहीं भेजते कि ‘जमाना ठीक नहीं है।’ अतः बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए इस जमाने को ठीक करना आवश्यक है अर्थात् हमें बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें सामाजिक सुरक्षा की गारण्टी देनी होगी।

(ग) रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता–अनेक प्रयासों के बाद भी बहुत–से सरकारी एवं गैर–सरकारी क्षेत्र ऐसे हैं, जिनको महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। सैन्य–सेवा एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें महिलाओं को पुरुषों के समान रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। यान्त्रिक अर्थात् टेक्नीकल क्षेत्र विशेषकर फील्ड वर्क को भी महिलाओं की सेवा के योग्य नहीं माना जाता है इसलिए इन क्षेत्रों में सेवा के लिए पुरुषों को वरीयता दी जाती है।

यदि हमें बेटियों को आगे बढ़ाना है तो उनके लिए सभी क्षेत्रों में रोजगार के समान अवसर उपलब्ध कराने होंगे। यह सन्तोष का विषय है कि अब सैन्य और यान्त्रिक आदि सभी क्षेत्रों में महिलाएँ रोजगार के लिए आगे आ रही हैं और उन्हें सेवा का अवसर प्रदानकर उन्हें आगे आने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।

बेटियाँ पढ़ें और आगे बढ़ें, इसका दायित्व केवल सरकार पर नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति पर इस बात का दायित्व है कि वह अपने स्तर पर वह हर सम्भव प्रयास करे, जिससे बेटियों को पढ़ने और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिले। हम यह सुनिश्चित करें कि जब हम घर से बाहर हों तो किसी भी बेटी की सुरक्षा पर हमारे रहते कोई आँच नहीं आनी चाहिए।

यदि कोई उनके मान–सम्मान को ठेस पहुँचाने की तनिक भी चेष्टा करे तो आगे बढ़कर उसे सुरक्षा प्रदान करनी होगी और उनके मान–सम्मान से खिलवाड़ करनेवालों को विधिसम्मत दण्ड दिलाकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा, जिससे हमारी बेटियाँ उन्मुक्त गगन में पंख पसारे नित नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकें।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1. “पढ़े बेटियाँ, बढ़े बेटियाँ” से क्या मतलब है? 

उत्तर- “पढ़े बेटियाँ, बढ़े बेटियाँ” से तात्पर्य यह है कि जब तक हम लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं देंगे तब तक लड़कियाँ बढ़ेंगी नहीं। एक समाज को अच्छा बनाने के लिए सिर्फ लड़कों का ही नहीं लड़कियों के लिए भी शिक्षा बहुत अनिवार्य है।

प्रश्न 2. बेटी पर कौन-सा स्लोगन सही है?

उत्तर-बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, देश को प्रगति के पथ पर लाओ। जब उन्हें बचाएंगे और पढ़ाएँगे तभी हम विश्वगुरु बन पाएँगे। अगर बेटा एक अभिमान है, तो बेटियाँ भी वरदान हैं। जीवन, शिक्षा एवं प्यार, बेटियों का भी है अधिकार।

प्रश्न 3.बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर-बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का उद्देश्य: ऐसे में बेटियों के प्रति समाज की इस नकारात्मक सोच में बदलाव लाने और उन्हें शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने में सहयोग देने के लिए सरकार बालिका के माता-पिता को उसके भविष्य के लिए बचत करने की सुविधा प्रदान कर उन्हें आर्थिक सहयोग प्रदान करती है।

प्रश्न 4.बेटियाँ अपने पिता से ज्यादा प्यार क्यों करती हैं?

उत्तर-बेटियाँ स्वाभाविक रूप से अपने पिता के साथ संबंध बनाने की लालसा रखती हैं, और वे विशेष रूप से अपने पिता से भावनात्मक और शारीरिक स्नेह को संजोती हैं। वास्तव में, मेग मीकर के शोध के अनुसार, जब लड़कियों और पिताओं के बीच एक मजबूत संबंध होता है, तो बेटियां जीवन में कई अलग-अलग स्तरों पर बेहतर करती हैं।

प्रश्न 5.बेटी का क्या महत्व है?

उत्तर-विवाह के बाद नये रिश्तों को तन-मन से स्वीकारती है बेटी। बेटी को शिक्षित करना, पूरे परिवार को शिक्षित करना है, बेटी बड़ी होकर पत्नी -माँ बन परिवार को संजोती है। वो जन्मदात्री ही नहीं चरित्र निर्मात्री भी है। एक शिक्षित बेटी पूरे परिवार को नई दिशा, रोशनी व नया परिवेश देती है।